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चोल राजवंश – समृद्धि और विरासत

चोल (तमिल: சோழர்) प्राचीन और मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख राजवंश था, जिसने दक्षिण भारत में 9वीं सदी से 13वीं सदी के बीच अपना शासन स्थापित कर एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य बनाया। इसकी राजधानी तंजावुर (तंजौर) थी और राज्य का केन्द्रीय क्षेत्र तमिलनाडु के कावेरी मैदान में फैला था। इतिहास की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, चोल राजवंश की उत्पत्ति कावेरी नदी घाटी में हुई थी और उरैयुर (वर्तमान तिरुचिरापल्ली) इसका सबसे पुराना राजधानी शहर था। चोल वंश की संस्थापक परंपरा की कथाएँ करिकाल चोल (संगम युग) से जोड़ी जाती हैं, लेकिन वास्तविक वैभव और विस्तार 9वीं सदी से आरंभ हुआ। प्राचीन काल [Ancient Period] में चोलों का ज़िक्र मिलता है और मध्य मध्यकाल [Medieval Period] के आरंभ में उनका पुनरुत्थान हुआ। कुल मिलाकर, 400 वर्ष से अधिक समय तक शासन करने वाले चोल शासकों ने दक्षिण भारत के अतिरिक्त श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों पर भी विजय प्राप्त की। हिंदी इंडियन (Hindi Indian) जैसे इतिहास प्रेमी वेबसाइट पर चोल राजवंश का यह संपूर्ण इतिहास प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें शासन व्यवस्था, कला-कौशल, महत्वपूर्ण घटनाक्रम और विरासत का गहन विवेचन किया गया है।

उदय और प्रारंभिक इतिहास

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चोलों का पुनरुत्थान 9वीं सदी के मध्य में हुआ। इस युग का संस्थापक विजयालय चोल था (लगभग 848–871 ईसवी)। विजयालय ने पल्लव अधीनता में रहते हुए तंजावुर पर अधिकार किया और उसे नया राजधानी बनाया। पल्लवों ([Pallava Dynasty]) के पतन का लाभ उठाते हुए विजयालय ने मुल्ताननगरी की सत्ता पर अपना कब्ज़ा मजबूत किया और चोल साम्राज्य की नींव रखी। उसके पश्चात् आदित्य प्रथम (871–907) ने चोल अधिकार क्षेत्र को और बढ़ाया और पल्लवों को पराजित कर तमिल क्षेत्र में चोल प्रभुत्व स्थापित किया। आदित्य के बाद परांतका प्रथम (907–955) ने दक्षिण भारत के और इलाकों में प्रभाव जमाया। उसने पांड्यों, केरल के शासकों और बाहरी आक्रमणकारियों को परास्त किया तथा श्रीलंका के उत्तरी भाग पर आक्रमण किया। परांतका प्रथम की विजय गाथाओं में एक महत्वपूर्ण घटना यह थी कि उन्होंने समय-समय पर राष्ट्रकूट (Rashtrakuta Dynasty) सम्राट कर्ण तृतीय को भी दो बार पराजित किया। हालांकि अंततः 949 ईस्वी में कर्ण तृतीय ने परांतका को पराजित कर चोल साम्राज्य की नींव को हिला दिया। परंतक के बाद तीसरी पीढ़ी के कई राजाओं ने शासन किया; गंडरादित्य, अरिंजय और सुंदर चोल (परातक द्वितीय) इनमें प्रमुख थे।

प्रमुख सम्राट और विजय अभियान

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विजयालय से राजराज तक

विजयालय से आरंभ होकर कई चोल राजा सत्ता में आए, जिनमें आदित्य और परंतक के बाद का सबसे महत्वपूर्ण सम्राट था राजराज प्रथम (985–1014 ई.)। राजराज प्रथम ने दक्षिण भारत में अपनी सत्ता को अडिग किया और अपने पूर्वजों की सीमाएँ काफी बढ़ाईं। उसने सबसे पहले पश्चिमी गंगाओं (Gangas) को पराजित कर उनके प्रदेश को अपने अधीन किया। इसके बाद पश्चिमी चालुक्यों (Chalukya Dynasty) के साथ जारी युद्धों में उसने शानदार जीत हासिल की। दक्षिण में केरल के चेर राजाओं पर विजय प्राप्त कर उनके क्षेत्र पर अधिकार किया। पांड्य राजाओं को हराकर मदुरै का नियंत्रण भी चोलों ने अपने कब्जे में कर लिया। इसके अतिरिक्त राजराज ने श्रीलंका के उत्तरी भाग को जीतकर उसमें चोल प्रभुत्व स्थापित किया। इन सैन्य सफलताओं के साथ ही राजराज ने चोल साम्राज्य की सीमा की मर्यादा पुनर्स्थापित की।

राजराज प्रथम द्वारा 1010 ईस्वी में बनवाया गया बृहदेश्वर मंदिर (बृहदीश्वरर मंदिर), तंजावुर का भव्य शिवमंदिर, चोल स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है। राजराज प्रथम ने विजय के धन से इस मंदिर का निर्माण करवाया, जो 66 मीटर ऊँचे व्याम के साथ विश्व का उच्चतम मंदिर है। इसका विशाल शिवलिंग एकल अंगूठे के आकार का पत्थर है, और पूरी बनावट में त्रिशंकु (कुख्यात) शैली की कला निहित है। बृहदेश्वर मंदिर को स्मारक की दृष्टि से उच्च महत्व प्राप्त है और यह यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। चोलों की स्थापत्य कला का यह सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसमें भव्य गर्भगृह, विशाल प्रांगण और कलात्मक मूर्तिकला देखी जाती है।

राजराज प्रथम के ही पुत्र राजेंद्र प्रथम (1014–1044 ई.) ने चोल साम्राज्य को और भी विशाल बनाया। उसने श्रीलंका पर पूर्ण विजय की और वहाँ चोल उत्तराधिकारी नियुक्त किए। राजेंद्र ने नौसेनाध्यक्ष को सीईलोन भेजा, जिससे मालदीव और लक्षद्वीप जैसे द्वीपसमूह भी चोल नियंत्रण में आए। फिर 1023 ई. में राजेंद्र ने उत्तर भारत की ओर भी अभियान किया। उसने कलिंग, उड़ीसा और बंगाल के चंद राजाओं को परास्त कर बंगाल के पाल राजवंश (Pala Dynasty) के राजा महीपाला को पराजित किया। इस विजय यात्रा का उद्देश्य गंगा नदी का पवित्र जल प्राप्त करना था। राजा राजेंद्र ने विजयी होकर अपने नए राजधानी गंगैकोंडाचोलपुरम (गंगायोंदा चोलापुरम) में गंगा जल गिराकर आराधना की थी। गंगैकोंडाचोलपुरम में एक विशाल शिवमंदिर है जो बृहदेश्वर से भी पहले बन कर तैयार हुआ था, और इसका प्रांगण चोल वास्तुकला का दूसरा शानदार उदाहरण है। इन अभियानों से चोल साम्राज्य ने उत्तरी भारत के सीमाओं को स्पर्श किया और उनका नाम चारों दिशाओं में फैल गया।

बाद के शासक और अंत

राजेंद्र के उत्तराधिकारी राजाधिराज प्रथम (1044–1054 ई.) ने दक्षिण में पांड्यों और केरल पर विजय पाई, परंतु पश्चिमी चालुक्यों से कोप्पम के युद्ध में वीरगति प्राप्त की। उसके बाद राजेंद्र द्वितीय (1052–1064 ई.) ने चालुक्यों पर विजय प्राप्त की। वीरराजेंद्र (1063–1069 ई.) के शासन में चोल साम्राज्य अपने पूर्ववत आकार में रहा। कुलोत्तुंग प्रथम (1070–1120 ई.), जो पूर्वी चालुक्य शासक की छत्रछाया से चोल सिंहासन पर बैठा, ने राजनीतिक समरस्ता स्थापित की और चोल शासन को स्थिर किया। कुलोत्तुंग ने अपनी माँ के ताऊ होयसल राजाओं के साथ निकट संपर्क बनाए रखा और सुदूरदर्शी नीतियों द्वारा साम्राज्य को शांतिपूर्ण रखा। हालांकि 12वीं सदी के उत्तरार्ध में चोलों की शक्ति में गिरावट दिखने लगी। 1216 ईस्वी के बाद अंततः राजेंद्र तृतीय (1246–1279) के शासन में चोल साम्राज्य समाप्त हो गया, और दक्षिण भारत में पांड्य वंश का उदय हुआ।

प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था

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चोल शासन व्यवस्था व्यवस्थित और कुशल थी। राजा को सर्वोच्च शक्ति प्राप्त थी, परंतु स्थानीय स्तर पर स्वशासन को प्रोत्साहित किया गया था। साम्राज्य को मंडलम (प्रांत), नाडु (जिला) और कोट्टम (क्षेत्र) जैसे प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था, जिनके अधिकारी राजा द्वारा नियुक्त होते थे। गाँवों में ग्रामसभा और सभा जैसी संस्थाएं स्थानीय स्वशासन संभालती थीं, जो सिंचाई, भूमि कर, न्याय और धार्मिक कार्यों को संचालित करती थीं। कुल मिलाकर चोल प्रशासन में केंद्रीकृत प्रणाली के साथ-साथ विकेन्द्रीकृत गांव सरकार भी थी। राजस्व संग्रह प्रणाली भी सुव्यवस्थित थी; भूमि उत्पाद पर कर लिया जाता था और विभिन्न श्रेणियों में बँटा हुआ कराधान प्रणाली थी।

चोल अर्थव्यवस्था कृषि और व्यापार पर आधारित थी। साम्राज्य की मुख्य समृद्धि कपास व्यापार से जुड़ी थी। कावेरी नदी के आस-पास उपजाऊ भूमि पर कपास की खेती लोकप्रिय थी। प्रमुख बंदरगाह पुहार (कोंबईपत्तनम) और मदुरै अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के केंद्र थे, जहाँ से कपड़ा और मसाले आदि निर्यात होते थे। समुद्री व्यापार के लिए मजबूत नौसेना थी, जो हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में प्रभुत्व बनाए रखती थी। चोल नौसेना ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापारिक मार्ग नियंत्रित किए। इस प्रकार से चोल साम्राज्य ने लौह और तांबे के उद्योग के साथ-साथ हस्तशिल्प जैसे चाँदी-ताम्र मूर्तिकला में भी उत्कृष्टता हासिल की।

कला, संस्कृति और स्थापत्य

चोल युग में कलाओं और संस्कृति का उत्कर्ष हुआ। ब्रह्म मूर्तिकला के क्षेत्र में चोल आद्यकाल के संगमरमर और ताम्र शिल्प कला के लिए विख्यात रहे। विशेषकर नटराज (नटराजन) की चोलकालीन कांस्य मूर्तियाँ विश्वप्रसिद्ध हैं, जो नृत्यरत शिव की अभिव्यक्ति करती हैं। चोल शासकों ने ब्राह्म्णों को विशेष प्रतिष्ठा दी और शिव, विष्णु तथा ब्रह्मा जैसे देवताओं के मंदिरों का सृजन किया। दक्षिण भारतीय मंदिर शैली की नाटकीय वास्तुकला चोलों ने और विकसित की। थंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर और गंगैयकोंड चोलपुरम का मंदिर इसकी गवाही देते हैं।

नटराज् मूर्ति (शिव के रात्रिनृत्य रूप में) चोल कालीन कांस्य शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। चित्र में दिख रही यह मूर्ति सलेमार्शल म्यूजियम (सलार जंग संग्रहालय) की है, जहाँ चोल राजवंश की मूर्तिकला कला की अद्भुतता प्रदर्शित है। चोल काल में इस प्रकार की कांस्य मूर्तियों को बड़े पैमाने पर मूर्तिकारों द्वारा तैयार किया गया, जो मंदिरों में स्थापना के लिए समर्पित की जाती थीं। इसी कारण चोल संस्कृति ने भारतीय मूर्तिकला कला को अमर बना दिया।

गंगैयकोंड चोलपुरम का मुख्य मंदिर, जिसे राजेन्द्र प्रथम ने बनवाया था, चोल वास्तुकला की दूसरी बड़ी मिसाल है। इसकी ऊंची मूर्धा (विमाना) है और परिसर में सौन्दर्यपूर्ण राहत-शिल्प देखे जा सकते हैं। इस मंदिर का निर्माण बृहदेश्वर के बाद हुआ और इसकी छाया कभी भी धरती पर नहीं पड़ने वाला चमत्कारिक सिद्धांत भी प्रचलित है। गंगैयकोंड चोलपुरम को बृहदेश्वर के बाद चोल स्थापत्य का प्रमुख स्मारक माना जाता है। चोल शिल्पकारों ने पत्थर की कलाकृतियों, नक्काशियों और काष्ठकला में अपनी क्षमता दिखाई, जो वर्तमान में भी देखते हैं।

पतन और विरासत

पतन_और_विरासत

13वीं सदी के आरंभ में चोल साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर हुआ। पड़ोसी पांड्य राजवंश ने लगातार संघर्ष कर चोल क्षेत्रों में घुसपैठ की, और 1279 ई. तक चोल वंश का अंत हो गया। श्रीलंका में भी सिंहल राजाओं ने वापसी की, जिससे चोल नियंत्रण समाप्त हुआ। इस प्रकार दक्षिण भारत पर पांड्यों का प्रभुत्व आया। उत्तरी भारत में चोलों के पतन के बाद धीरे-धीरे [Pratihara Dynasty] के प्रभाव में भी बदलाव आया और अंततः 12वीं सदी के अंत में उत्‍तर भारत में [Delhi Sultanate] का उदय हुआ।

चोल साम्राज्य की विरासत आज भी जीवित है। तमिलनाडु में अनेक मंदिरों में उनकी स्थापत्यशैली, मूर्तिकला और भाषा कला की गाथा सुनाई देती है। चोलों का पुरातन इतिहास [Ancient Period] से शुरू होकर [Medieval Period] तक फैला, जिसमें उन्होंने भारत की सांस्कृतिक-आर्थिक विरासत में अमूल्य योगदान दिया। Hindi Indian वेबसाइट पर हमने इस लेख में चोल राजवंश के उत्कर्ष से लेकर पतन तक के प्रमुख बिंदुओं का विवरण दिया है।

मुख्य बिंदु:

  • विजयालय चोल (9वीं सदी) ने तमिलनाडु में चोल साम्राज्य की नींव रखी।
  • राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में चोलों ने श्रीलंका, मालदीव व मालाया पहुँचकर समुद्री साम्राज्य स्थापित किया।
  • चोल शासन व्यवस्था संगठित थी: उन्होंने मंडलम-नाडु-कोट्टम जैसी इकाइयाँ बनाई और ग्राम सभाओं को स्वशासन का अधिकार दिया।
  • चोल वास्तुकला और कला जगत प्रसिद्ध है, विशेषकर बृहदेश्वर मंदिर और कांस्य नटराज मूर्तियाँ।
  • 13वीं सदी तक चोल साम्राज्य पतन की ओर गया और दक्षिण भारत में पांड्य वंश प्रमुख हो गया।

हम आशा करते हैं कि यह लेख चोल राजवंश के इतिहास को गहराई से समझने में सहायक रहा होगा। अधिक इतिहास संबंधी जानकारी के लिए Hindi Indian पर उपलब्ध अन्य चोल राजवंश तथा संबंधित आलेख पढ़ें।