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तुगलक वंश (1320–1413 ई.)

प्राचीन भारत के इतिहास (See प्राचीन काल) से मध्यकालीन काल (See मध्यकाल) तक की गाथा में दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) की स्थापना प्रमुख मोड़ रही है। इस सल्तनत का तीसरा वंश तुगलक वंश (Tughlaq Dynasty) था, जिसने 1320 ई. से 1413 ई. तक शासन किया। इस वंश की स्थापना ग़ियासुद्दीन तुगलक ने की और इन्हीं ने सिंचाई के लिए प्रारंभिक नहरों का निर्माण कराया। तुगलक वंश के तीन मुख्य शासक हुए: घियासुद्दीन तुगलक, उनके पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351), और फिरोज शाह तुगलक (1351–1388)। इन शासकों के काल में सम्राज्य का विस्तार पूरे भारत में फैला हुआ था; पहले दो का अधिकार लगभग पूरे देश में था और फिरोज शाह का साम्राज्य उनके बाद भी खिलजी वंश से कम नहीं था। फिरोज शाह की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत विघटित हो गई और उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया। यद्यपि तुगलक राजवंश औपचारिक रूप से 1412 ई. तक चला, लेकिन 1398 ई. में तैमूर के आक्रमण के साथ इसे समाप्त माना जाने लगा।

इस प्रकार तुगलक वंश मध्यकालीन भारत की दिल्ली सल्तनत का महत्वपूर्ण अध्याय है। इस लेख में Hindi Indian पर प्रकाशित इतिहास से संबंधित अन्य लेखों की तरह हम तुगलक वंश की स्थापना, शासकों के शासन काल, प्रमुख घटनाएँ, नीतियाँ और अंत की पड़ताल करेंगे।

तुगलक वंश का उदय और ग़ियासुद्दीन तुगलक

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दिल्ली सल्तनत के पहले दो वंश – ममलूक (दास) वंश और खिलजी वंश – के अंत के बाद तुगलक वंश का उदय हुआ। खिलजी वंश के अंतिम शासक खुसरो खान (एक हिंदू दास) की सत्ता 1320 ई. में गड़बड़ी से भर गई थी। उसी वर्ष दिल्ली के अभिजात वर्ग ने पंजाब के गवर्नर गाजी मलिक को आमंत्रित किया कि वह खिलजी वंश के अंत का नेतृत्व करे। गाजी मलिक ने तब खोखर आदिवासियों की एक सेना के साथ मार्च करके खुसरो खान को परास्त कर दिया। इसी हमले के बाद गाजी मलिक ने सिंहासन संभाला और स्वयं को घियासुद्दीन तुगलक की संज्ञा दी। इस प्रकार वर्ष 1320 में तुगलक वंश की नींव पड़ी।

घियासुद्दीन ने सत्ता में आते ही अनेक पहल कीं। उन्होंने मंगोल आक्रमणों से रक्षा हेतु दिल्ली के छह किलोमीटर पूर्व तुगलकाबाद नामक नया किला-नगर बनवाया। साथ ही उन्होंने अपने सहयोगियों को पुरस्कृत किया और खुसरो खान के साथ जुड़े अधिकारियों को दंडित किया। अपने शासन की शुरुआत में घियासुद्दीन ने मुसलमानों पर कर दरें घटाई, जबकि हिंदुओं पर कर बढ़ा दिए, जिससे तत्कालीन तनावपूर्ण माहौल में नये वंश को समर्थन मिला। वह सिंचाई योग्य खेती के लिए नहरों का निर्माण भी कराने लगा।

दिल्ली में घियासुद्दीन तुगलक का मकबरा (तुगलकाबाद), तुगलक वंश की स्थापत्य विरासत का एक उदारहण।

1324–1325 ई. में घियासुद्दीन ने बंगाल (लखनौती) पर आक्रमण किया और वहां के सुल्तान शम्सुद्दीन फिरोज शाह को हराया। इस विजय के बाद जब वह अपने प्रिय पुत्र महमूद के साथ दिल्ली लौट रहा था, तो बड़े पुत्र जौनु (जो बाद में मुहम्मद बिन तुगलक बना) ने षड्यंत्र रचा। उसने एक ख़ास लकड़ी का कुष्क बनवाया, जो अंदर से कमजोर था, ताकि घियासुद्दीन और महमूद उस पर चलने से ही मारे जाएँ। 1325 ई. में यह योजनाबद्ध ढांचा गिर पड़ा और घियासुद्दीन के साथ महमूद की भी मृत्यु हो गई। इस घटना के तुरंत बाद जौनुखान ने स्वयं को मुहम्मद बिन तुगलक घोषित करके सिंहासन संभाला।

  • 1320 ई.: घियासुद्दीन तुगलक ने तख्त संभाला (दिल्ली सल्तनत का तीसरा वंश स्थापित किया)।
  • 1321 ई.: मुहम्मद बिन (तत्कालीन जौनुखान) को दक्षिण भारत के राज्यों पर चढ़ाई के लिए भेजा गया, हालांकि पहला आक्रमण असफल रहा।
  • 1324–25 ई.: बंगाल के लखनौती पर विजय, शम्सुद्दीन फिरोज शाह को हराया।
  • 1325 ई.: घियासुद्दीन और उनके पुत्र महमूद की मौत; मुहम्मद बिन तुगलक ने सिंहासन संभाला।

मुहम्मद-बिन-तुगलक के शासनकाल की नीतियाँ

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मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351) अत्यंत महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी शासक था, किंतु उसकी कई नीतियाँ अति उत्तेजक सिद्ध हुईं। उसने पूरे भारत पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अनेक अभियानों की योजना बनाई। 1330 के दशक की शुरुआत में उसने महाराष्ट्र के देओगीर (देवलगढ़) को दौलताबाद का नाम देकर दूसरी राजधानी घोषित किया, ताकि दक्षिण में नियंत्रण मज़बूत हो सके। इसके लिए मुसलमानों और हिंदुओं को जोर-जबरदस्ती दक्षिण की ओर ले जाया गया।

मुहम्मद की सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद योजना “कांस्य-सिक्का प्रयोग” थी। उसने तांबे और पीतल के सिक्के जारी करके चांदी की सिक्कों की कमी पूरी करने का प्रयास किया। इस प्रयोग से नकली सिक्के जोर पकड़ गए और खज़ाना भारी नुकसान में चला गया। अंततः उसे अपनी ही योजना वापस लेनी पड़ी और बड़े खर्च पर असली-सिक्कों को वापस खरीदना पड़ा। इस पर अकाल भी पड़ा, जिससे देश में दशकों तक भूखमरी और दंगे छिड़े। इसी तरह उसने गैर-मुस्लिम किसानों पर अत्यधिक कर (जजिया सहित) वसूलना शुरू किया, जिससे बड़ी संख्या में किसान खेती छोड़कर जंगल भाग गए और विद्रोह फूट पड़े।

मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत ने अपने विस्तार का चरम देखा। उसने मलवा, गुजरात, मराठवाड़ा, तेलंगाना, बंगाल और बिहार के कई हिस्सों पर आक्रमण किए। परन्तु दूर के प्रदेशों पर नियंत्रण रखना मुश्किल रहा और विद्रोह सामान्य हो गए। परन्तु इन प्रयोगों और अभियानों की वजह से मुहम्मद पर परिवार और अरबी सलाहकारों का दबाव भी बढ़ा। अंततः मार्च 1351 में गुजरात-सीमे के विद्रोहियों का दमन करते समय मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई। उसके निधन पर दिल्ली सल्तनत का भू-राजनीतिक प्रभाव नर्मदा नदी के उत्तर तक ही सिमट गया था।

मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियाँ और प्रयोग

  • पूरे भारत में विस्तार: मुहम्मद बिन ने उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में सेनाएँ भेजीं।
  • राजधानी परिवर्तन: 1327 ई. में देओगीर (महाराष्ट्र) को दौलताबाद नाम देकर दूसरी राजधानी बनाया।
  • कांस्य सिक्का प्रयोग: चांदी की कमी दूर करने के लिए तांबे-पितल के सिक्के जारी किए, लेकिन फर्जीगिरी और घाटा बढ़ने पर योजना विफल रही ।
  • कर वृद्धि: गैर-मुसलमान किसानों पर दसगुना-बीसगुना कर वसूला गया, जिससे अकाल और विद्रोह हुए।
  • आखिरी वर्ष: बढ़ते विद्रोहों को दबाते हुए मार्च 1351 ई. में सिंध के विद्रोहियों को दंडित करते समय मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई।

फिरोज शाह तुगलक का शासनकाल और उपलब्धियाँ

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मुहम्मद के बाद फिरोज़ शाह तुगलक (1351–1388) ने सिंहासन संभाला। वह 37 वर्ष तक शासन किया, जो दिल्ली सल्तनत में सबसे लंबी अवधि थी। गरीब और किसानों को राहत देने के लिए उसने अपने पूर्ववर्तियों के अत्याचारों पर अंकुश लगाने का दावा किया । (उल्लेखनीय है कि उसने अपने संस्मरणों में अत्याचार-विरोधी नीतियों का ज़िक्र किया है।) फिरोज शाह की सबसे बड़ी पहचान उसके बांटे हुए अवसंरचनात्मक कार्य हैं। उसने यमुना-घग्गर तथा यमुना-सतलज नहरों के निर्माण के साथ-साथ कई पुल, मदरसे और मस्जिदें बनवायीं ।

दिल्ली में फिरोज शाह तुगलक द्वारा निर्मित फिरोज़ शाह कोटला (कोटला फिरोजाबाद) का पश्चिमी द्वार – तुगलक वंश की स्थापत्य कला का अभूतपूर्व उदाहरण।

फिरोज शाह ने ऐतिहासिक स्तम्भों का भी संरक्षण किया। दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला किले में उसने अशोक की एक प्राचीन काँसे की स्तम्भ (टोपरा स्तंभ) को मस्जिद के समीप स्थापित कराया । इसके अतिरिक्त उन्होंने वज़ीराबाद की मशहूर मस्जिद, कुतुब नदी पर पुल, हौज़ खास तालाब और कई मदरसों का निर्माण कराया। इन परियोजनाओं से सिंचाई सुविधा बढ़ी और इमारतें सदीयों तक उपयोग में रहीं।

  • बड़ी नहरें और पुल: यमुना-घग्गर और यमुना-सतलज तक नहरें खोदीं; नदी पर कई नए पुल बनाए ।
  • मदरसे-मस्जिद: वज़ीराबाद मस्जिद (दिल्ली के उत्तर में) समेत अनेक मस्जिद और मदरसे बनवाए।
  • आर्किटेक्चर: ऐतिहासिक अशोक स्तंभों को पुनः स्थापित किया ; फिरोज़ शाह कोटला किला इसका प्रमुख उदाहरण है।
  • कर नीति में अंतर: उसने अनुयायियों को कर वसूलने की सुविधा दी; अपने संस्मरणों में बताया कि मुहम्मद बिन के अत्याचारों पर रोक लगाई।

1388 ई. में फिरोज शाह की मृत्यु के बाद तुगलक वंश की शक्ति धीमी पड़ने लगी। उसके उत्तराधिकारियों में आपसी संघर्ष चरम पर था। दो बार (1384 व 1394) संप्रदायिक और परिवारिक संघर्षों ने तुगलक शासन को अस्थिर कर दिया। 1388 के बाद अल्पायु के तुगलक खान और अबू बक्र शाह ने आशाजनक शासन स्थापित किया, लेकिन वे भी एक वर्ष से कम समय में पड़ोसी द्वेषों में खो गए।

तैमूर का आक्रमण और तुगलक वंश का पतन

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1388 से 1398 तक शक्ति की लड़ाई और राजनैतिक उथल-पुथल जारी रही। 1398 ई. में तैमूर (आक्रमणकारियों के तिमूरलंग) ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया। तत्कालीन तुगलक शासक महमूद खां (जो 1394 से सत्ता में था) ने तैमूर के आगे दिल्ली छोड़ दी। तैमूर ने आठ दिन तक दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया और वह लगभग एक लाख बंदियों की हत्या करवा दी। इस घातक आक्रमण और कत्लेआम ने दिल्ली को लगभग एक सदी के लिए वीरान कर दिया।

तैमूर की विदाई से पूर्व उसने खिज्र खां को दिल्ली में अपना फ़रमानवाज़ (सुल्तान-प्रतिनियुक्त) नियुक्त किया। खिज्र खां ने शीघ्र ही दिल्ली पर अधिकार जमा लिया और 1414 ई. में सय्यद वंश की स्थापना की। तुगलक वंश के विध्वंस के बाद कई प्रदेश स्वराज्यवादी बन गए; गुजरात, मालवा, जौनपुर आदि नए सल्तनतों का स्वरूप ले चुके थे। अंततः सय्यद वंश के बाद लोधी वंश ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया और 1526 ई. तक तुगलक-जैसी मुस्लिम वंश की विरासत को आगे बढ़ाया।

तुगलक वंश की विरासत

तुगलक_वंश_की_विरासत

तुगलक वंश की शासकों की योजनाएँ मिश्रित प्रभाव छोड़ गईं। एक ओर उनकी दूरदर्शिता और नवान्वेषी नीतियाँ (जैसे सिंचाई परियोजनाएँ, मेटल सिक्के का प्रयोग, राजधानी हस्तांतरण) उन्हें विशेष बनाती हैं। दूसरी ओर, आर्थिक प्रयोगों और कर नीतियों में भारी विफलताएँ सम्राज्य को कमजोर करने वाली रहीं। वास्तुकला में इस वंश की छाप आज भी दिल्ली में बरकरार है – तुगलकाबाद के किले, घियासुद्दीन का मकबरा, फिरोज़ शाह कोटला, हौज खास तालाब व मस्जिदें आदि इस काल की निशानियाँ हैं।

इस युग में औपनिवेशिक ऐतिहासिक वर्णन में तुगलक राजा-बादशाह को अक्सर क्रूरता या अति-निर्णय के लिए याद किया जाता है; पर ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हैं कि वे मजबूत सेनापतियों, माल संग्रह, शिक्षा-धर्म के सशक्तिनिर्माता भी थे। तैमूर के दिल्ली आगमन और तुगलक सत्ता की टूट से मध्यकालीन भारत की राजनीतिक संरचना में बड़े परिवर्तन आए, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रीय सल्तनतों का विकास हुआ।

निष्कर्ष: तुगलक वंश ने मात्र 94 वर्षों तक शासन किया, लेकिन इस काल की घटनाएँ मध्यकालीन इतिहास में उल्लेखनीय हैं। ग़ियासुद्दीन ने नए नगर व नेहरें बनाए, मुहम्मद बिन ने व्यापक प्रयोग किए और फिरोज़ शाह ने सभ्यताओं की नयी इमारतें खड़ी कीं। इन शासकों की योजनाएँ और दूरदर्शिता जटिल परिणाम लेकर आई, जो उत्तर भारत के इतिहास में स्थायी छाप छोड़ गए। अधिक विस्तृत ऐतिहासिक सामग्री के लिए ‘Hindi Indian’ पर प्रकाशित अन्य लेख भी देखें – जैसे दिल्ली सल्तनत के पहले दो वंश (ममलूक व खिलजी), तथा तुगलक के बाद के सय्यद और लोधी वंशों का इतिहास। आपकी रूचि और खोज के लिए हिंदी इंडियन (Hindi Indian) की अन्य सामग्रियाँ उपयोगी साबित होंगी।