हिंदी इंडियन के इस विशेष लेख में, हम आपको लेकर चलेंगे मुगल साम्राज्य के एक ऐसे दिलचस्प और दुखद अध्याय के सफर पर, जिसने यह साबित कर दिया कि औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य की नींव पूरी तरह से हिल चुकी थी। यह कहानी है बादशाह फर्रुखसियर की, जो खुद एक कमजोर शासक साबित हुए, लेकिन उनके शासनकाल में ही वह घटना घटी जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी – “ईस्ट इंडिया कंपनी” को बंगाल में व्यापारिक छूट देने वाला फरमान।
फर्रुखसियर का शासन (1713-1719) मुगल इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट था। यह वह दौर था जब तख्त के लिए खून-खराबा आम बात हो गई थी, और सच्ची ताकत बादशाह के हाथों में न होकर दरबार के शक्तिशाली सरदारों के पास चली गई थी। चलिए, इसी कहानी को विस्तार से जानते हैं।
फर्रुखसियर से पहले का मुगल साम्राज्य: एक पृष्ठभूमि

फर्रुखसियर को समझने के लिए, हमें उस समय के मुगल साम्राज्य को समझना होगा। औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद, मुगल साम्राज्य एक विशाल लेकिन कमजोर होती हुई ताकत बनकर रह गया था।
- उत्तराधिकार का संकट: औरंगजेब के बाद, उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने तख्त संभाला, लेकिन उनका शासनकाल छोटा रहा।
- जहांदार शाह का उदय: बहादुर शाह प्रथम के बाद, उसके बेटे जहांदार शाह ने सत्ता हासिल की। जहांदार शाह एक विलासी और अयोग्य शासक साबित हुए।
- सैय्यद बंधुओं का उदय: इसी दौरान दो शक्तिशाली भाई – सैय्यद हसन अली खान (जिन्हें बाद में ‘किंगमेकर’ कहा गया) और सैय्यद हुसैन अली खान – मुगल दरबार में एक ताकतवर गुट के रूप में उभरे।
जहांदार शाह की कमजोर नीतियों और उनकी पसंदीदा बेगम लाल कुंवर के अत्यधिक प्रभाव से असन्तुष्ट होकर, सैय्यद बंधुओं ने फर्रुखसियर को सत्ता दिलाने का फैसला किया।
फर्रुखसियर का प्रारंभिक जीवन और सत्ता संघर्ष

जन्म और वंश
फर्रुखसियर का जन्म 20 अगस्त, 1683 को औरंगजेब के शासनकाल में हुआ था। वह मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के पुत्र आजम शाह के पुत्र थे। इस तरह, वह औरंगजेब के पड़पोते थे। उनकी माँ फातिमा बेगम थीं, जो सैय्यद वंश से थीं। यह रिश्ता आगे चलकर उनके लिए बेहद अहम साबित हुआ।
सैय्यद बंधुओं का साथ और तख्त की ओर बढ़ता कदम
जब जहांदार शाह ने 1712 में तख्त संभाला, तो फर्रुखसियर बिहार का सूबेदार था। सैय्यद बंधुओं ने, जो जहांदार शाह से नाराज थे, फर्रुखसियर को विद्रोह के लिए उकसाया और सैन्य सहायता दी।
- अगरा का युद्ध (10 जनवरी, 1713): फर्रुखसियर और सैय्यद बंधुओं की संयुक्त सेना ने जहांदार शाह की सेना को अगरा के पास हरा दिया।
- जहांदार शाह का अंत: इस युद्ध के बाद, जहांदार शाह को पकड़ लिया गया और फर्रुखसियर के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई।
इस जीत के बाद, 11 जनवरी, 1713 को फर्रुखसियर को आधिकारिक तौर पर मुगल सम्राट घोषित किया गया। उसने अपना शासनकाल शुरू किया, लेकिन उसकी सत्ता की नींव ही उन लोगों पर टिकी थी जिन्होंने उसे तख्त दिलाया था – सैय्यद बंधु।
फर्रुखसियर का शासनकाल (1713-1719): सत्ता का संघर्ष

फर्रुखसियर का शासनकाल बाहरी चुनौतियों से ज्यादा आंतरिक साजिशों और सत्ता के लिए संघर्ष का काल था।
सैय्यद बंधुओं का वर्चस्व और फर्रुखसियर की असहमति
सत्ता में आते ही सैय्यद बंधुओं को ऊंचे पदों से नवाजा गया:
- सैय्यद हुसैन अली खान को मीर बख्शी (सेनापति) बनाया गया।
- सैय्यद हसन अली खान को वज़ीर (प्रधानमंत्री) का पद दिया गया।
शुरुआत में फर्रुखसियर ने उनकी बात मानी, लेकिन जल्द ही वह अपने को एक “कठपुतली सम्राट” समझने लगा। उसे लगने लगा कि असली सत्ता सैय्यद बंधुओं के हाथों में है और वह सिर्फ एक नाममात्र का बादशाह है। इससे उसके मन में उनके प्रति गहरी नफरत और ईर्ष्या पनपने लगी।
प्रमुख घटनाएं और चुनौतियाँ
- सिखों के साथ संघर्ष: फर्रुखसियर के शासनकाल में सिखों के गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के उत्तराधिकारी बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिखों ने एक शक्तिशाली विद्रोह किया। बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के फौजदार वज़ीर खान को मार गिराया, जिसने गुरु गोबिंद सिंह के बच्चों की हत्या की जिम्मेदारी ली थी। फर्रुखसियर ने सैय्यद बंधुओं के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। आखिरकार, बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों को घेर लिया गया और 1716 में उन्हें बेरहमी से शहीद कर दिया गया।
- अजीत सिंह से संघर्ष: मारवाड़ के शासक अजीत सिंह ने भी मुगल अधिकार को चुनौती दी। सैय्यद हुसैन अली खान ने एक बड़ी सेना के साथ मार्च किया और अजीत सिंह को समझौते के लिए मजबूर किया। अजीत सिंह ने अपनी बेटी का विवाह फर्रुखसियर से करने का प्रस्ताव रखा, जिसे बादशाह ने स्वीकार कर लिया। लेकिन यह शादी भी सैय्यद बंधुओं की मर्जी के खिलाफ थी, जिसने तनाव और बढ़ा दिया।
- ईस्ट इंडिया कंपनी को फरमान (1717): फर्रुखसियर के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी – अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया गया फरमान।
- क्या था इस फरमान में? इस फरमान के तहत, कंपनी को बंगाल में बिना किसी शुल्क के व्यापार करने का अधिकार मिल गया (सिर्फ 3000 रुपये सालाना के बदले में)।
- प्रभाव: यह फरमान भविष्य में मुगल साम्राज्य के लिए बेहद घातक साबित हुआ। इसने कंपनी को आर्थिक रूप से मजबूत किया और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखने में मदद की। कहा जाता है कि फर्रुखसियर ने यह फरमान एक अंग्रेज सर्जन, विलियम हेमिल्टन के कहने पर दिया, जिसने बादशाह को एक दर्दनाक बीमारी से ठीक किया था।
- क्या था इस फरमान में? इस फरमान के तहत, कंपनी को बंगाल में बिना किसी शुल्क के व्यापार करने का अधिकार मिल गया (सिर्फ 3000 रुपये सालाना के बदले में)।
फर्रुखसियर और सैय्यद बंधुओं के बीच बढ़ता टकराव
फर्रुखसियर सैय्यद बंधुओं के प्रभुत्व से मुक्त होना चाहता था। उसने उन्हें हटाने के लिए कई साजिशें रचीं:
- उसने सैय्यद हुसैन अली खान की हत्या करवाने की कोशिश की, लेकिन वह विफल रही।
- उसने दरबार के अन्य समूहों, जैसे कि तुर्कानी समूह, को सैय्यद बंधुओं के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की।
लेकिन सैय्यद बंधु अधिक चालाक और शक्तिशाली साबित हुए। उन्हें पता चल गया कि बादशाह उनके लिए खतरा बन गया है।
फर्रुखसियर का पतन और क्रूर अंत

आखिरकार, सैय्यद बंधुओं का धैर्य टूट गया। जब सैय्यद हुसैन अली खान दक्कन में एक अभियान पर थे, तब फर्रुखसियर ने फिर से उनकी हत्या की साजिश रची। इस बार सैय्यद बंधुओं ने निर्णायक कार्रवाई करने का फैसला किया।
- फरवरी 1719 में, सैय्यद हुसैन अली खान दिल्ली लौटे।
- 28 फरवरी, 1719 की रात, सैय्यद बंधुओं ने अपने विश्वसनीय सैनिकों के साथ लाल किले पर हमला बोल दिया।
- फर्रुखसियर ने खुद को हरम के एक कमरे में छुपा लिया, लेकिन उसे पकड़ लिया गया।
फर्रुखसियर को अंधा करके कैद कर लिया गया। आखिरकार, 28-29 अप्रैल, 1719 की दरमियानी रात, उसके कारावास में ही उसकी हत्या कर दी गई। उसे जबरदस्ती गला घोंटकर मार डाला गया। कहा जाता है कि उसकी लाश को हुमायूं के मकबरे में दफनाया गया।
फर्रुखसियर की हत्या मुगल इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। यह पहली बार था जब किसी मुगल बादशाह की इतनी बेरहमी से हत्या की गई थी। सैय्यद बंधुओं ने उसके बाद दो और कमजोर बादशाहों – रफी उद-दरजात और शाहजहां द्वितीय – को तख्त पर बैठाया, लेकिन उनका वर्चस्व भी ज्यादा दिन नहीं चल सका।
फर्रुखसियर के शासनकाल का ऐतिहासिक मूल्यांकन और विरासत
फर्रुखसियर को इतिहास में एक कमजोर, अदूरदर्शी और साजिशकर शासक के रूप में याद किया जाता है।
- कमजोर व्यक्तित्व: वह अपने सहयोगियों पर भरोसा करने और उन्हें नियंत्रित करने में विफल रहा।
- ऐतिहासिक भूल: उसने ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया गया फरमान भविष्य की चुनौतियों को नहीं भांप पाया, जिसने अंततः भारत को गुलाम बनाने का रास्ता साफ किया।
- साम्राज्य की दुर्दशा का प्रतीक: उसका शासनकाल और उसकी हत्या यह साबित करती है कि औरंगजेब के बाद का मुगल साम्राज्य केवल नाम का शासक रह गया था। केंद्रीय सत्ता पूरी तरह से कमजोर हो चुकी थी।
- कला और संस्कृति: उसके छोटे से शासनकाल में कोई विशेष वास्तुशिल्प या सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं दर्ज है।
फर्रुखसियर की कहानी हमें सिखाती है कि सत्ता अगर सही हाथों में न हो और नेतृत्व में दूरदर्शिता की कमी हो, तो एक विशाल साम्राज्य भी रेत की दीवार की तरह ढह सकता है।
निष्कर्ष: एक त्रासद सम्राट की कहानी

फर्रुखसियर का जीवन और शासनकाल एक त्रासदी से कम नहीं है। वह एक ऐसा बादशाह था जिसने सत्ता पाने के लिए सैय्यद बंधुओं का सहारा लिया, लेकिन उनसे मुक्त होने की कोशिश में ही अपनी जान गंवा बैठा। उसका शासनकाल मुगल साम्राज्य के मध्यकाल के अंत और पतन की शुरुआत का स्पष्ट संकेत था।
उसके बाद आने वाले बादशाह जैसे मुहम्मद शाह और अहमद शाह बहादुर भी साम्राज्य को बचा नहीं पाए और मुगल सत्ता सिकुड़ती चली गई, जब तक कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर तक नहीं पहुँच गई।
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