भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे साम्राज्य हैं जिन्होंने न केवल विशाल भूभाग पर राज किया, बल्कि जनमानस में एक अदम्य भावना का संचार किया। मराठा साम्राज्य ऐसा ही एक गौरवशाली अध्याय है। 17वीं शताब्दी में महाराष्ट्र की धरती से उपजा यह साम्राज्य, केवल एक राजनीतिक ताकत नहीं, बल्कि ‘स्वराज्य’ की एक विचारधारा थी, जिसकी नींव छत्रपति शिवाजी महाराज ने रखी। यह वह युग था जब मुगल साम्राज्य अपने चरम पर था, लेकिन एक नई शक्ति ने दक्कन में अपना सिर उठाना शुरू कर दिया था।
यह लेख, Hindi Indian की ओर से, आपको मराठा साम्राज्य के उत्थान, विस्तार और अंतिम पतन की एक विस्तृत, रोमांचक और तथ्यपूर्ण यात्रा पर ले जाएगा। हम छत्रपति शिवाजी के शासनकाल से लेकर पेशवाओं के उदय, पानीपत के युद्ध के पश्चात की स्थिति और अंग्रेजों के खिलाफ लड़े गए आंग्ल-मराठा युद्धों तक की पूरी गाथा को समझेंगे।
भाग 1: उदय का युग – छत्रपति शिवाजी महाराज (1674-1680)

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
- जन्म: 19 फरवरी, 1630 (या 1627), शिवनेरी दुर्ग, पुणे के निकट।
- माता-पिता: शाहजी भोंसले (मालिक अम्बर के सेनापति) और जीजाबाई। जीजाबाई के व्यक्तित्व और धार्मिक संस्कारों का शिवाजी पर गहरा प्रभाव पड़ा।
- शिक्षा एवं प्रभाव: उनकी शिक्षा दादाजी कोंडदेव ने संभाली, जिन्होंने उन्हें राजनीति, युद्ध कला और प्रशासन की शिक्षा दी। उनके गुरु समर्थ रामदास ने उनमें राष्ट्रीय चेतना और धर्म के प्रति निष्ठा का संचार किया।
स्वराज्य की स्थापना का संकल्प
- शिवाजी ने कम उम्र में ही महसूस कर लिया था कि दक्कन की जनता मुगलों और दक्कनी सल्तनतों के अत्याचारों से त्रस्त है।
- उन्होंने ‘स्वराज्य‘ (अपना राज्य) की स्थापना का संकल्प लिया, जो केवल भूमि जीतने के बजाय जनकल्याण पर आधारित एक आदर्श राज्य की स्थापना थी।
प्रारंभिक सफलताएँ और विस्तार
- तोरण का किला (1646): यह पहला किला था जिस पर शिवाजी ने अधिकार किया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई किलों पर अपना अधिकार स्थापित किया, जैसे रायगढ़, प्रबलगढ़, और कोंडाना।
- अफजल खाँ की हार (1659): बीजापुर के सुल्तान ने अनुभवी सेनापति अफजल खाँ को शिवाजी को पकड़ने भेja। प्रतापगढ़ की पहाड़ियों में, एक मुठभेड़ में शिवाजी ने ‘वाग्नख’ (बाघ के पंजे) नामक हथियार का इस्तेमाल कर अफजल खाँ का वध कर दिया।
- शाइस्ता खाँ को पराजय (1663): मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खाँ को एक विशाल सेना के साथ दक्कन भेja। शाइस्ता खाँ ने पुणे पर कब्जा कर लिया, लेकिन शिवाजी ने एक साहसिक रात्रि हमले में उस पर हमला किया, जिसमें शाइस्ता खाँ घायल हो गया और उसकी उँगलियाँ कट गईं।
शिवाजी की नौसेना
- शिवाजी भारत के उन गिने-चुने शासकों में से थे, जिन्होंने नौसेना के महत्व को पहचाना।
- उन्होंने कोलाबा (अलिबाग) और सिंधुदुर्ग जैसे नौसैनिक अड्डों की स्थापना की।
- उनकी नौसेना ने सिद्दियों और पुर्तगालियों जैसे समुद्री शत्रुओं को कड़ी टक्कर दी और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
छत्रपति का राज्याभिषेक (1674)
- 6 जून, 1674 को रायगढ़ दुर्ग में एक भव्य समारोह में शिवाजी का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ।
- इस घटना का बहुत महत्व था। इसने उनकी संप्रभुता को औपचारिक रूप दिया और उनके शासन को धार्मिक व वैधानिक मान्यता मिली।
शिवाजी का प्रशासनिक ढाँचा
शिवाजी न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे। उन्होंने एक सुसंगठित प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की।
- अष्टप्रधान मंडल: यह आठ मंत्रियों की एक परिषद थी, जो शासन के विभिन्न पहलुओं का संचालन करती थी।
- पेशवा (प्रधानमंत्री): प्रशासन का प्रमुख।
- मजमुआदार (वितमंत्री): वित्त और राजस्व का प्रबंधन।
- वाकयानवीस (गृहमंत्री): गृह और राजनयिक मामले।
- दबीर/सुमन्त (विदेशमंत्री): विदेश नीति।
- सर-ए-नौबत (सेनापति): सेना का प्रमुख।
- पंडितराव (धर्माधिकारी): धार्मिक मामले और दान।
- न्यायाधीश (चीफ जस्टिस): न्यायिक प्रमुख।
- मंत्री (राज्य सचिव): राजकीय रिकॉर्ड रखना।
- पेशवा (प्रधानमंत्री): प्रशासन का प्रमुख।
- सैन्य प्रबंधन:
- सेना में नियमित भर्ती और सीधा वेतन।
- किलों का सुदृढ़ीकरण और प्रबंधन।
- गुरिल्ला युद्ध (गनीमी कौशल) की रणनीति में माहिर।
- नियमित घुड़सवार सेना और पैदल सेना के अलावा, एक अलग तोपखाना इकाई।
- सेना में नियमित भर्ती और सीधा वेतन।
- राजस्व व्यवस्था:
- रायतवाड़ी व्यवस्था को लागू किया, जहाँ किसानों से सीधे भू-राजस्व वसूला जाता था।
- कर-वसूली में मानवीय व्यवहार और लचीलापन।
- रायतवाड़ी व्यवस्था को लागू किया, जहाँ किसानों से सीधे भू-राजस्व वसूला जाता था।
मृत्यु और विरासत
- 3 अप्रैल, 1680 को रायगढ़ में शिवाजी महाराज का देहांत हो गया।
- उनकी विरासत अमर है। उन्होंने न केवल एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, बल्कि एक ऐसी प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था दी, जिसने भविष्य में मराठा साम्राज्य को भारत की सर्वप्रमुख शक्ति बनने का मार्ग दिखाया। वह सदैव न्यायप्रिय, धर्मनिरपेक्ष और जनता के हितैषी शासक के रूप में याद किए जाते हैं।
भाग 2: संघर्ष और संकट का दौर – संभाजी से ताराबाई (1680-1707)
संभाजी महाराज (1680-1689)
- शिवाजी की मृत्यु के बाद, उनके बड़े पुत्र संभाजी गद्दी पर बैठे।
- वह एक वीर और साहसी योद्धा थे, लेकिन उनके शासनकाल को मुगलों के साथ निरंतर संघर्ष में बीतना पड़ा।
- औरंगजेब ने स्वयं दक्कन में डेरा डाल लिया और मराठा साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास किया।
- गिरफ्तारी और शहादत (1689): एक विश्वासघात के चलते, संभाजी और उनके सलाहकार कवि कलश को मुगलों ने पकड़ लिया। उन पर अत्याचार किए गए और अंततः उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना ने मराठों में और भी अधिक आक्रोश भर दिया।
राजाराम और ताराबाई – संघर्ष की नई परिभाषा
- संभाजी की मृत्यु के बाद, उनके छोटे भाई राजाराम सिंहासन पर बैठे।
- जब मुगलों ने रायगढ़ पर कब्जा कर लिया, तो राजाराम ने कर्नाटक स्थित जिंजी दुर्ग से मुगलों का विरोध जारी रखा।
- राजाराम की मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी महारानी ताराबाई ने नेतृत्व संभाला। ताराबाई एक असाधारण रूप से सक्षम शासक और सेनानायक साबित हुईं।
- उन्होंने मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध को और तेज किया और मराठा शक्ति को पुनर्जीवित किया। उनके नेतृत्व में मराठों ने मुगलों को लगातार परेशान किया।
भाग 3: पेशवाओं का उदय और साम्राज्य का विस्तार (1707-1761)

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा। इस स्थिति का लाभ उठाकर मराठों ने अपना विस्तार शुरू किया। इस दौरान, छत्रपति एक प्रतीकात्मक शासक बनकर रह गए और वास्तविक सत्ता पेशवाओं (प्रधानमंत्रियों) के हाथों में केंद्रित हो गई।
बालाजी विश्वनाथ (1713-1720) – पेशवाई की नींव
- उन्होंने छत्रपति शाहू के साथ मिलकर साम्राज्य को स्थिर किया।
- 1719 में, उन्होंने मुगल बादशाह फर्रुखसियर के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत मराठों को दक्कन में चौथ और सरदेशमुखी कर वसूलने का अधिकार मिल गया। इसने मराठा साम्राज्य की वित्तीय नींव मजबूत की।
बाजीराव प्रथम (1720-1740) – ‘शमशेर बहादुर’
- बालाजी विश्वनाथ के पुत्र बाजीराव प्रथम, मराठा इतिहास के सबसे महान सेनानायकों में से एक थे।
- उन्होंने कहा, “हमारे साम्राज्य की सीमाएँ हिन्दू पद पादशाही तक फैलनी चाहिए।”
- प्रमुख विजयें:
- मालवा (1728): उन्होंने मुगल सूबेदार को हराकर मालवा पर अधिकार कर लिया।
- बुंदेलखंड (1729): बुंदेला राजा छत्रसाल की मदद की और उनके साथ गठबंधन किया।
- गुजरात पर अधिकार: मुगल सूबेदार को पराजित किया।
- दिल्ली पर धावा (1737): बाजीराव ने दिल्ली तक चढ़ाई की और मुगल बादशाह को चुनौती दी।
- भोपाल का युद्ध (1737): दिल्ली वापस लौटते समय, उन्होंने हैदराबाद के निजाम-उल-मुल्क को भोपाल के पास करारी शिकस्त दी।
- मालवा (1728): उन्होंने मुगल सूबेदार को हराकर मालवा पर अधिकार कर लिया।
बालाजी बाजीराव (नाना साहब) (1740-1761) – विस्तार का शिखर
- बाजीराव प्रथम के पुत्र बालाजी बाजीराव के काल में मराठा साम्राज्य अपने चरम विस्तार पर पहुँच गया।
- उन्होंने मराठा शक्ति को उत्तर भारत, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत तक फैलाया।
- प्रमुख घटनाएँ:
- पंजाब पर अधिकार (1758): मराठा सेना ने पंजाब में प्रवेश किया और अहमद शाह अब्दाली के गवर्नर को हराया। इसने मराठों और अफगान शक्ति के बीच सीधा टकराव पैदा कर दिया।
- दक्षिण में संघर्ष: उन्होंने हैदराबाद के निजाम और मैसूर राज्य के साथ संघर्ष किया।
- पंजाब पर अधिकार (1758): मराठा सेना ने पंजाब में प्रवेश किया और अहमद शाह अब्दाली के गवर्नर को हराया। इसने मराठों और अफगान शक्ति के बीच सीधा टकराव पैदा कर दिया।
पानीपत का तीसरा युद्ध (1761) – एक राष्ट्रीय त्रासदी
- कारण: मराठों के पंजाब में प्रवेश और अहमद शाह अब्दाली की महत्वाकांक्षा के बीच टकराव अपरिहार्य था।
- मैदान-ए-जंग: 14 जनवरी, 1761, पानीपत (वर्तमान हरियाणा)।
- मराठा सेना: सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में, जिसमें विशाल राव (पेशवा के पुत्र) और इब्राहिम खान गार्दी के तोपखाने शामिल थे।
- परिणाम: मराठों की भीषण पराजय हुई। सदाशिव राव भाऊ, विशाल राव सहित लगभग एक लाख मराठा सैनिक मारे गए।
- प्रभाव:
- मराठा शक्ति को एक गहरा झटका लगा। उनकी सैन्य ताकत और युवा पीढ़ी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ।
- हालाँकि साम्राज्य तुरंत नहीं टूटा, लेकिन इसने मराठा संघ की एकता को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया।
- इस युद्ध का सबसे बड़ा लाभ अंग्रेजों को मिला, जिन्हें भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का सुनहरा अवसर मिल गया।
- मराठा शक्ति को एक गहरा झटका लगा। उनकी सैन्य ताकत और युवा पीढ़ी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ।
भाग 4: पुनरुत्थान और अंतिम पतन (1761-1818)

पानीपत की हार के बाद, मराठा शक्ति फिर से उभरी, लेकिन अब यह एक केंद्रीकृत साम्राज्य नहीं रहा। सत्ता विभिन्न मराठा सरदारों – पेशवा (पुणे), सिंधिया (ग्वालियर), होलकर (इंदौर), भोंसले (नागपुर) और गायकवाड़ (बड़ोदा) – के बीच बँट गई।
माधवराव प्रथम (1761-1772) – अंतिम सक्षम पेशवा
- उन्होंने पानीपत के बाद बिखरे साम्राज्य को फिर से संगठित किया।
- उन्होंने हैदराबाद के निजाम को पराजित किया और मराठा प्रभुत्व को पुनर्स्थापित किया।
- दुर्भाग्यवश, कम उम्र में ही तपेदिक से उनकी मृत्यु हो गई, जिसने मराठा साम्राज्य के अंतिम पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
आंग्ल-मराठा युद्ध – अंग्रेजों से संघर्ष
मराठा सरदारों के बीच आपसी फूट और अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के कारण तीन विनाशकारी युद्ध हुए।
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782): यह युद्ध अधिकतर अंग्रेजों और सिंधिया व होलकर के बीच लड़ा गया। इसका कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला और सालबाई की संधि (1782) के साथ समाप्त हुआ।
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805): पेशवा बाजीराव द्वितीय और सिंधिया व भोंसले के बीच आंतरिक कलह के कारण, अंग्रेजों ने हस्तक्षेप किया। इस युद्ध में अंग्रेजों को सफलता मिली।
- दिल्ली की लड़ाई (1803): जनरल लेक ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजों के संरक्षण में ले लिया।
- लसवाड़ी और असई की लड़ाई: जनरल आर्थर वेलेजली (बाद में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) ने सिंधिया और भोंसले की सेनाओं को हराया।
- दिल्ली की लड़ाई (1803): जनरल लेक ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अंग्रेजों के संरक्षण में ले लिया।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818): यह अंतिम और निर्णायक युद्ध था। अंग्रेजों ने मराठा सरदारों की शक्ति को पूरी तरह कुचलने का निश्चय किया।
- प्रमुख लड़ाइयाँ: खड़की, सीताबल्डी, कोरेगाँव, महिदपुर।
- परिणाम: मराठों की अंतिम हार हुई। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें पेंशन देकर बिठूर भेज दिया गया।
- प्रभाव: इसके साथ ही मराठा साम्राज्य का अंत हो गया और अधिकांश मराठा क्षेत्र सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में आ गए। सिंधिया, होलकर, भोंसले और गायकवाड़ जैसे शासक रियासतों (Princely States) के रूप में बचे रहे, लेकिन वे अंग्रेजों के अधीनस्थ थे। ग्वालियर राज्य (सिंधिया) और इंदौर राज्य (होलकर) प्रमुख मराठा रियासतें बनी रहीं।
- प्रमुख लड़ाइयाँ: खड़की, सीताबल्डी, कोरेगाँव, महिदपुर।
भाग 5: मराठा साम्राज्य का सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान

- साहित्य: मराठी साहित्य ने इस युग में बहुत उन्नति की। संत साहित्य, शिवभारत, और पेशवाओं के दरबारी इतिहास लिखे गए।
- वास्तुकला: शनिवार वाडा (पुणे), लालबाग पैलेस (पुणे), और विभिन्न मंदिरों एवं जलाशयों का निर्माण हुआ।
- प्रशासनिक विरासत: मराठों द्वारा विकसित राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था ने बाद के शासकों को प्रभावित किया।
निष्कर्ष
मराठा साम्राज्य का इतिहास भारत के लिए गर्व और अफसोस दोनों से भरा है। एक ओर जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महानायक और बाजीराव जैसे अद्भुत सेनानायक हुए, वहीं दूसरी ओर आपसी फूट और दूरदृष्टि की कमी ने एक विशाल साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया। फिर भी, मराठों ने भारत के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है। उन्होंने एक ऐसे युग में हिंदवी स्वराज्य का झंडा बुलंद किया, जब देश की अस्मिता खतरे में थी। उनका संघर्ष, बलिदान और प्रशासनिक कौशल आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।उम्मीद है कि Hindi Indian पर यह विस्तृत लेख आपको मराठा साम्राज्य के इतिहास को समझने में मददगार साबित हुआ होगा। इतिहास के ऐसे ही रोचक पहलुओं के बारे में और जानने के लिए हमारी वेबसाइट ब्राउज़ करते रहें। क्षेत्रीय राज्य और सिख साम्राज्य पर हमारे विस्तृत लेख भी पढ़ें। अपने सुझाव और विचार कमेंट में जरूर बताएं।