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छत्रपति शिवाजी द्वितीय: वह दुर्भाग्यशाली छत्रपति जिसका जीवन मुगल कैद की त्रासदी में बीता

भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे भी चेहरे हैं जिनका जीवन गहरी त्रासदी और विडंबना से भरा हुआ है। छत्रपति शिवाजी द्वितीय ऐसे ही एक विस्मृत और दुर्भाग्यशाली शासक हैं। वह वीर छत्रपति संभाजी महाराज के पुत्र और छत्रपति शिवाजी महाराज के पौत्र थे। उनका जन्म मुगल कैद में हुआ, उनका बचपन बंदी के रूप में बीता और उनका छत्रपति के रूप में कार्यकाल इतना छोटा और विवादों से घिरा रहा कि इतिहास में वह महज एक पदचिह्न बनकर रह गए।

शिवाजी द्वितीय की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे युग की है जब मराठा साम्राज्य अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। यह कहानी है मुगल हिरासत की कठोरता, मराठा दरबार के भीतर की सत्ता की लड़ाई और एक ऐसे युवा के साहस की, जिसे इतिहास ने लगभग भुला दिया। यह लेख, Hindi Indian की ओर से, आपको इस ‘भुला दिए गए छत्रपति’ के जीवन के हर पहलू से रूबरू कराएगा।

अध्याय 1: जन्म और प्रारंभिक जीवन: मुगल बंदी के रूप में जन्म (1685-1700)

एक कैद में पैदा हुआ शाहजादा

  • जन्म तिथि: 9 जून, 1685
  • जन्म स्थान: मुगल बंदीगृह (संभवतः औरंगजेब के शिविर में)।
  • माता-पिता: पिता छत्रपति संभाजी महाराज और माता येसूबाई।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह वह समय था जब औरंगजेब ने दक्कन में डेरा डाल रखा था और मराठा साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए संघर्षरत था।

पिता की शहादत और बंदी जीवन

  • मार्च 1689 में, जब शिवाजी द्वितीय महज चार वर्ष के थे, मुगलों ने उनके पिता संभाजी महाराज को भीषण यातना देकर शहीद कर दिया।
  • इसके तुरंत बाद, नवंबर 1689 में, मुगलों ने मराठा राजधानी रायगढ़ पर कब्जा कर लिया।
  • रायगढ़ के पतन के साथ ही, छोटे शिवाजी और उनकी माँ येसूबाई को मुगलों ने बंदी बना लिया।
  • इस प्रकार, एक शाहजादे का बचपन मुगल कैंपों की कठोर निगरानी में बीता। उन्हें और उनकी माँ को औरंगजेब के दरबार में ‘मान्यता प्राप्त बंदियों’ के रूप में रखा गया।

मुगल दरबार में एक मराठा युवराज

  • औरंगजेब के लिए, शिवाजी द्वितीय और येसूबाई केवल बंदी ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोहरे थे।
  • उन्हें इस उम्मीद में जीवित रखा गया कि भविष्य में मराठा सरदारों को समझौते के लिए मजबूर करने में इनका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
  • इस कैद ने शिवाजी द्वितीय के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला होगा। उनका पूरा बचपन और युवावस्था का आरंभिक दौर स्वतंत्रता से वंचित रहा।

अध्याय 2: मुक्ति और सिंहासनारोहण: एक राजनीतिक चाल (1707)

औरंगजेब की मृत्यु और बदलता परिदृश्य

  • 3 मार्च, 1707 को औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया।
  • औरंगजेब के पुत्र आजम शाह और बहादुर शाह के बीच उत्तराधिकार का युद्ध शुरू हो गया।

मुक्ति का कारण

  • औरंगजेब के पौत्र और आजम शाह के पुत्र बिदार बख्त ने अपने पिता का समर्थन करने के लिए मराठा सहयोग चाहा।
  • इस सहयोग के बदले में, उसने 8 मई, 1707 को शिवाजी द्वितीय और येसूबाई को मुक्त कर दिया।
  • लगभग 18 वर्षों की लंबी कैद के बाद, शिवाजी द्वितीय एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में महाराष्ट्र की धरती पर कदम रखने के लिए स्वतंत्र थे।

छत्रपति का राज्याभिषेक

  • मुक्ति के बाद, येसूबाई और उनके समर्थक मराठा सरदारों ने शिवाजी द्वितीय को वैध उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।
  • 12 जून, 1707 को कोल्हापुर में शिवाजी द्वितीय का औपचारिक रूप से छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक किया गया।
  • हालाँकि, उनकी स्थिति कमजोर थी। वह लंबे समय तक कैद में रहने के कारण सैन्य या प्रशासनिक अनुभव से वंचित थे और वास्तविक सत्ता उनके संरक्षकों के हाथों में थी।

अध्याय 3: उत्तराधिकार का संकट और गृहयुद्ध (1707-1710)

ताराबाई का विरोध

  • शिवाजी द्वितीय के राज्याभिषेक को सभी मराठा सरदारों ने स्वीकार नहीं किया।
  • छत्रपति राजाराम महाराज की विधवा महारानी ताराबाई, जिन्होंने राजाराम की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य का कुशलता से नेतृत्व किया था, ने इसका जबरदस्त विरोध किया।
  • ताराबाई ने दावा किया कि उनके अपने पुत्र शिवाजी (तृतीय) ही वास्तविक उत्तराधिकारी हैं, क्योंकि उनके पिता राजाराम ने संभाजी की मृत्यु के बाद शासन किया था और वह कभी मुगलों के अधीन नहीं रहे।
  • इस प्रकार, मराठा साम्राज्य दो गुटों में बंट गया:
    • शिवाजी द्वितीय का गठ: येसूबाई और उनके समर्थक सरदार।
    • ताराबाई का गठ: ताराबाई और उनके पुत्र शिवाजी तृतीय के समर्थक।

शाहू महाराज की वापसी: संकट और अवसर

  • इसी उत्तराधिकार संघर्ष के बीच, एक नया और निर्णायक मोड़ आया।
  • औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुर शाह प्रथम ने एक अन्य मराठा बंदी, शाहू महाराज (संभाजी महाराज के भतीजे और शिवाजी महाराज के पौत्र) को 1707 में मुक्त कर दिया।
  • बहादुर शाह की योजना मराठों के बीच और अधिक फूट डालने की थी।
  • शाहू महाराज के महाराष्ट्र लौटते ही, उत्तराधिकार की लड़ाई और जटिल हो गई। अब तीन दावेदार थे: शिवाजी द्वितीय, ताराबाई का पुत्र, और शाहू।

खेड की लड़ाई (12 अक्टूबर, 1707)

  • शाहू महाराज ने अपने दावे को बलपूर्वक स्थापित करने का फैसला किया।
  • उनकी सेना का सामना ताराबाई की सेना से खेड नामक स्थान पर हुआ।
  • इस लड़ाई में शाहू महाराज विजयी रहे। इस जीत ने उन्हें मराठा साम्राज्य का प्रमुख दावेदार बना दिया।

अध्याय 4: पतन और अंत (1710-1712)

शाहू महाराज के समक्ष समर्पण

  • खेड की लड़ाई के बाद, शिवाजी द्वितीय की स्थिति कमजोर होती चली गई।
  • शाहू महाराज ने कोल्हापुर पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
  • आखिरकार, 1710 में, शिवाजी द्वितीय और येसूबाई ने शाहू महाराज के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

अंतिम दिन और मृत्यु

  • शाहू महाराज ने उदारता दिखाते हुए शिवाजी द्वितीय और येसूबाई के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया।
  • उन्हें सतारा में एक शाही निवास में रखा गया, लेकिन वे वास्तव में अब ‘राजकीय बंदी’ थे।
  • 14 मार्च, 1726 को सतारा में ही छत्रपति शिवाजी द्वितीय का निधन हो गया। उनकी मृत्यु एक ‘रहस्य’ बनी रही, हालाँकि आधिकारिक तौर पर उनकी मृत्यु स्वाभाविक बताई गई।

अध्याय 5: ऐतिहासिक विरासत और मूल्यांकन

एक त्रासदी का प्रतीक

  • शिवाजी द्वितीय का जीवन भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। उनका जन्म कैद में हुआ, उनके पिता को उनकी आँखों के सामने शहीद किया गया, उनका बचपन बंदी के रूप में बीता और उनका शासनकाल गृहयुद्ध में समाप्त हुआ।
  • वह अपने जीवन में कभी भी वास्तव में ‘शासन’ नहीं कर पाए। वह हमेशा दूसरों की राजनीति का मोहरा बने रहे।

मराठा इतिहास में महत्व

  • उत्तराधिकार संघर्ष की शुरुआत: शिवाजी द्वितीय का राज्याभिषेक उस उत्तराधिकार संघर्ष की शुरुआत था जिसने भविष्य में कोल्हापुर और सतारा की अलग-अलग मराठा रियासतों को जन्म दिया।
  • एक वैधता का प्रतीक: मुगल कैद से मुक्त होने के बावजूद, शिवाजी द्वितीय का छत्रपति संभाजी महाराज के सीधे वारिस होने का दावा मजबूत था, जिसने शुरू में उन्हें कुछ सरदारों का समर्थन दिलाया।
  • शाहू महाराज के उदय का मार्ग: शिवाजी द्वितीय और ताराबाई के बीच चल रहे संघर्ष ने ही शाहू महाराज के लिए रास्ता साफ किया, जो आगे चलकर एक शक्तिशाली छत्रपति बने और whose reign saw the rise of the Peshwas.

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निष्कर्ष

छत्रपति शिवाजी द्वितीय का जीवन इतिहास की एक ऐसी करुण कहानी है जो हमें याद दिलाती है कि सत्ता की लड़ाई में मानवीय भाग्य अक्सर कितना क्रूर हो सकता है। वह अपने महान दादा और वीर पिता की विरासत को संभालने के लिए पैदा हुए थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें कभी इसका मौका नहीं दिया। उनकी कहानी स्वतंत्रता के मूल्य और राजनीतिक षड्यंत्रों की कीमत का एहसास कराती है। भले ही उनका नाम इतिहास के मुख्य पन्नों में बड़े अक्षरों में न लिखा गया हो, लेकिन मराठा इतिहास की जटिल बुनावट में उनका स्थान हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा।

उम्मीद है कि Hindi Indian पर यह विस्तृत लेख आपको छत्रपति शिवाजी द्वितीय के दुखद जीवन और उनके युग को समझने में मददगार साबित हुआ होगा। इतिहास के ऐसे ही रोचक और मार्मिक पहलुओं के बारे में और जानने के लिए हमारी वेबसाइट ब्राउज़ करते रहें। अपने सुझाव और विचार कमेंट में जरूर बताएं।