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कृष्णराजा वोडेयार तृतीय: मैसूर का वह राजा जिसने हारकर भी जीत लिया दिल

नमस्कार, इतिहास प्रेमियों! स्वागत है आपका hindiindian.in के एक विशेष लेख में। आज हम बात करेंगे मैसूर के उस महान शासक की, जिसने लगभग 70 वर्षों तक राज किया, लेकिन जिसका जीवन संघर्ष, समर्पण और कला के प्रति अटूट प्रेम की अद्भुत गाथा है। हम बात कर रहे हैं कृष्णराजा वोडेयार तृतीय (Krishnaraja Wodeyar III) की, जिन्हें मुम्मड़ि कृष्णराज वोडेयार के नाम से भी जाना जाता है।

Table of Contents

उनका शासनकाल एक ऐसा युग था जब राजनीतिक सत्ता तो अंग्रेजों के हाथों खिसक रही थी, लेकिन सांस्कृतिक और कलात्मक ऊंचाइयों ने नए शिखर छुए। आइए, इस बहुआयामी व्यक्तित्व के जीवन की सैर करें और समझें कि क्यों उन्हें ‘कन्नड़ का भोज राजा’ कहा जाता है।

प्रस्तावना: इतिहास के एक अलग नायक की कहानी

जब हम इतिहास के पन्नों में झांकते हैं, तो अक्सर हमें ऐसे योद्धा मिलते हैं जिन्होंने अपनी तलवार के बल पर इतिहास रचा। लेकिन कृष्णराजा वोडेयार तृतीय उन नायकों में से हैं जिन्होंने कलम, कला और सृजन के बल पर अमरत्व प्राप्त किया। उनका जीवन मध्यकालीन भारत से [आधुनिक भारत] के संक्रमण काल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वह वोडेयार राजवंश के 22वें महाराजा थे, जिनका राज्याभिषेक मात्र पांच वर्ष की आयु में हुआ था। उनका लंबा शासनकाल (1799-1868) मैसूर राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

प्रारंभिक जीवन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जन्म और परिवार

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का जन्म 14 जुलाई 1794 को श्रीरंगपट्टनम के राजमहल में हुआ था। उनके पिता खासा चामराजा वोडेयार नवम थे और माता महारानी केम्पा नंजा अम्मानी अवरु थीं। उनका परिवार वोडेयार वंश से था, जो यदुराया वोडेयार के वंशज थे। उनके जन्म के समय मैसूर पर टीपू सुल्तान का शासन था, और वोडेयार राजवंश ने 1760 के दशक में हैदर अली के उदय के बाद अपनी वास्तविक सत्ता खो दी थी।

दादी का सपना: महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी

कृष्णराजा के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनकी दत्तक दादी महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी ने। वह कृष्णराजा वोडेयार द्वितीय की विधवा थीं। उन्होंने हैदर अली और टीपू सुल्तान के शासन को कभी स्वीकार नहीं किया। वह लगातार अंग्रेजों से संपर्क में थीं और मैसूर राज्य की गद्दी पर फिर से वोडेयार वंश को स्थापित करने का सपना देख रही थीं।

उन्होंने अंग्रेजों को टीपू सुल्तान और फ्रांसीसियों के बीच हुए गुप्त समझौते की जानकारी दी, जो अंग्रेजों के लिए बेहद अहम साबित हुई।

राज्याभिषेक: एक नए युग की शुरुआत

सिंहासन पर बैठना

[चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध] में टीपू सुल्तान की वीरगति के बाद, अंग्रेजों ने मैसूर राज्य को पुनर्गठित किया। महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी के प्रयास रंग लाए। 30 जून 1799 को, मैसूर के लक्ष्मीरमण स्वामी मंदिर के पास बने एक विशेष पंडाल में, मात्र पांच वर्षीय कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का भव्य राज्याभिषेक हुआ।

यह एक ऐतिहासिक क्षण था। इस समारोह में, प्रसिद्ध ब्रिटिश जनरल आर्थर वेलेजली (जो बाद में ड्यूक ऑफ वेलिंग्टन बने) ने स्वयं युवा राजा का हाथ पकड़कर उन्हें राजसी आसन तक पहुँचाया। इसी के साथ मैसूर में वोडेयार वंश का शासन पुनः स्थापित हुआ।

रीजेंसी और दीवान पूर्णैया

चूंकि राजा नाबालिग थे, इसलिए राज्य का कार्यभार उनकी दादी महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी की रीजेंसी में चलने लगा। टीपू सुल्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और एक कुशल प्रशासक दीवान पूर्णैया को मैसूर का दीवान नियुक्त किया गया। उन्हें निर्देश दिया गया कि वे राजा के बालिग होने तक राज्य के प्रति वफादार रहें। पूर्णैया ने बगावतों को दबाने, अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और कर प्रणाली में सुधार करने का काम किया।

व्यक्तिगत शासन और प्रारंभिक चुनौतियाँ

सत्ता की बागडोर संभालना

1810 की शुरुआत में, 16 वर्ष की आयु प्राप्त कर कृष्णराजा वोडेयार तृतीय ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। ब्रिटिश रेजिडेंट आर्थर कोल की सहमति से दीवान पूर्णैया से सत्ता का हस्तांतरण हुआ। हालांकि, इसके तुरंत बाद उन्हें दो बड़े झटके लगे। 1810 में ही उनकी संरक्षिका और प्रेरणास्रोत महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी का निधन हो गया, और 1812 में कुशल प्रशासक पूर्णैया का भी देहांत हो गया।

प्रशासनिक चुनौतियाँ

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय स्वभाव से बेहद उदार और दयालु व्यक्ति थे। उनके इसी स्वभाव के कारण वे प्रशासन पर सख्त नियंत्रण नहीं रख पाए। वे धार्मिक संस्थानों, मठों और मंदिरों को उदारतापूर्वक दान देते थे, जिसका असर राजकोष पर पड़ने लगा। उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने जड़ें पकड़ लीं। भू-राजस्व निर्धारण की दोषपूर्ण पद्धतियों ने समस्या को और बढ़ा दिया।

संकट के बादल: नगर विद्रोह और पदच्युति

बढ़ता असंतोष

1820 के दशक में मैसूर और अंग्रेजों के बीच संबंधों में खटास आने लगी। ब्रिटिश रेजिडेंट आर्थर कोल ने वित्तीय कदाचार के आरोप लगाए। हालांकि मद्रास के गवर्नर थॉमस मुनरो ने 1825 में जांच के बाद इन आरोपों को निराधार पाया, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

नगर विद्रोह (1830-31)

प्रशासनिक अव्यवस्था और किसानों पर बढ़ते करों के बोझ से नाराजगी चरम पर पहुंच गई। 1830 के अंत में, यह असंतोष एक बड़े विद्रोह के रूप में भड़क उठा, जिसे नगर विद्रोह (Nagar Rebellion) के नाम से जाना जाता है। यह विद्रोह मैसूर के कई हिस्सों में फैल गया।

अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने में कृष्णराजा वोडेयार तृतीय की मदद तो की, लेकिन इसी का फायदा उठाते हुए उन्होंने राजा पर कुशासन का आरोप लगा दिया। 19 अक्टूबर 1831 को, अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का प्रशासन सीधे अपने हाथों में ले लिया।

नाममात्र का शासक, वास्तविक कलाकार (1831-1868)

ब्रिटिश कमीशन का शासन

सत्ता से हटाए जाने के बाद, कृष्णराजा वोडेयार तृतीय के पास केवल राजा की उपाधि रह गई। अगले 50 वर्षों तक मैसूर पर ब्रिटिश कमिश्नरों का शासन रहा। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कमिश्नर सर मार्क कब्बन (Mark Cubbon) थे, जिन्होंने 1834 से 1861 तक सेवा की और मैसूर में एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सूत्रधार

राजनीतिक रूप से हार चुके कृष्णराजा वोडेयार तृतीय ने अपनी सारी ऊर्जा और जुनून कला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण में लगा दी। यही वह समय था जब उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनका दरबार विद्वानों, कवियों, कलाकारों और संगीतकारों का केंद्र बन गया। उनके इस योगदान के कारण ही उनके शासनकाल को मैसूर का सांस्कृतिक स्वर्णिम काल भी कहा जाता है।

साहित्य और कला में अतुलनीय योगदान

बहुभाषाविद और लेखक

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय स्वयं एक महान विद्वान और लेखक थे। वे कन्नड़, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने 50 से अधिक रचनाएँ कीं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

  • श्रीतत्त्वनिधि (Sritattvanidhi): यह उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है, जो दक्षिण भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तिकला, चित्रकला और 122 योग मुद्राओं का एक अद्भुत संग्रह है।
  • सौगंधिकापरिणय (Sougandhikaparinaya): एक गद्य शैली में लिखी गई प्रेम कहानी।
  • इसके अलावा उन्होंने दशरथ नंदन चरितग्रहण दर्पणचतुरंग सार सर्वस्व और सूर्य चंद्र वंशावली जैसी कृतियों की रचना की।

संरक्षण और नवोन्मेष

उनके संरक्षण में कन्नड़ साहित्य में एक नई गद्य शैली का विकास हुआ, जो पारंपरिक चंपू शैली से अलग थी। उनके दरबार के प्रमुख विद्वानों में शामिल थे:

  • बसप्पा शास्त्री: जिन्होंने शेक्सपियर के ओथेलो का कन्नड़ में ‘शूरसेन चरित’ के रूप में अनुवाद किया।
  • देवचंद्र: जिन्होंने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘राजावली कथा’ लिखी।
  • केंपू नारायण: जिनकी कृति ‘मुद्रामंजूषा’ प्रसिद्ध है।

यक्षगान (Yakshagana) नाट्य शैली के विकास और संरक्षण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

संगीत और ललित कलाओं के प्रेमी

संगीत का स्वर्णिम काल

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय स्वयं एक कुशल वीणा वादक थे। उन्होंने अपने दरबार में कई प्रसिद्ध संगीतकारों को संरक्षण दिया, जिनमें वीणा वेंकटसुब्बैया और वीणा दोड्डासुब्बराया प्रमुख थे। उनके शासनकाल में मैसूर संगीत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा।

चित्रकला और वास्तुकला

उन्होंने राजमहल में एक कार्यशाला स्थापित की, जहाँ कलाकारों ने भित्तिचित्रों और सचित्र पांडुलिपियों पर काम किया। इनमें भागवत पुराण और रामायण के सचित्र संस्करण शामिल थे।
वास्तुकला के क्षेत्र में, यह एक संक्रमण काल था। इस दौरान कई मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार हुआ। मैसूर का रेजिडेंसी बंगला, गवर्नमेंट हाउस और वेलिंग्टन लॉज इसी काल की देन हैं।

एक अद्भुत शौक: बोर्ड गेम्स के जादूगर

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय की सबसे रोचक विशेषताओं में से एक थी पारंपरिक भारतीय बोर्ड गेम्स के प्रति उनका अगाध प्रेम। वे न केवल एक उत्कृष्ट खिलाड़ी थे, बल्कि गेम्स के संग्रहकर्ता और आविष्कारक भी थे।

गंजीफा का पुनरुद्धार

उन्हें गंजीफा (Ganjifa) कार्ड गेम को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने इस खेल में नए रंगों के सूट (16 तक) जोड़े और वाइल्ड कार्ड व ट्रम्प कार्ड की अवधारणा पेश की। मैसूर उनके संरक्षण में गंजीफा कार्ड बनाने का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

नाइट्स टूर और जटिल पहेलियाँ

वे शतरंज के ‘नाइट्स टूर’ (घोड़े की चाल) पहेली से मोहित थे। उन्होंने 144 खानों वाली शतरंज की बिसात पर इस पहेली को हल किया और उन खानों पर अक्षर अंकित करके शब्द पहेलियाँ (acrostics) बनाईं। उनके महल (जगनमोहन पैलेस) की दीवार पर यह पहेली आज भी मौजूद है।

अनोखे खेल और उपहार

उन्होंने [पचीसी] के ऐसे संस्करण बनाए जिन्हें 16 लोग एक साथ खेल सकते थे। उन्होंने रेशमी रुमालों पर खेलों के नक्शे छपवाए और उन्हें यूरोपीय मेहमानों को उपहार में दिया। इनमें से कई अद्भुत संग्रह आज लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूज़ियम में देखे जा सकते हैं।
यहाँ तक कि उन्होंने एक जादुई पहेली बॉक्स (trick box) भी बनाया था, जिसके अंदर 11 अलग-अलग खेल छिपे हुए थे।

बेंगलुरु के विकास में योगदान

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का नाम बेंगलुरु शहर के विकास से भी जुड़ा है। 1806 में, उनकी दादी महारानी लक्ष्मी अम्मानी देवी (उनकी नाबालिगी में) ने अंग्रेजों को सैन्य और व्यापारिक आवाजाही के लिए मद्रास (चेन्नई) से बेंगलुरु तक एक सड़क बनाने की अनुमति दी। यह सड़क आज ओल्ड मद्रास रोड के नाम से जानी जाती है। इस सड़क के निर्माण के दौरान अंग्रेजों ने जिस क्षेत्र में डेरा डाला, वह बाद में कृष्णराजापुरम (Krishnarajapura) के नाम से जाना गया, जो उनके परिवार के योगदान की याद दिलाता है।

अंतिम वर्ष और उत्तराधिकार

दत्तक पुत्र की खोज

चूंकि कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह एक वारिस को गोद लेना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। कई भारतीय और ब्रिटिश नेताओं, यहाँ तक कि हाउस ऑफ कॉमन्स में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई। अंततः 1864 में, उन्हें एक पुत्र गोद लेने की अनुमति मिली और उन्होंने चामराजेंद्र वोडेयार दशम को गोद लिया।

महाप्रयाण

लगभग 74 वर्ष की आयु में, 27 मार्च 1868 को कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का मैसूर के राजमहल में निधन हो गया। उनके जाने से मैसूर ने न केवल एक शासक खोया, बल्कि एक युग का अंत हो गया। उनके दत्तक पुत्र चामराजेंद्र वोडेयार X मैसूर के अगले महाराजा बने, जिनके शासनकाल में 1881 में मैसूर राज्य को वापस वोडेयार वंश को सौंप दिया गया। उनके बाद कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ और जयचामराजेंद्र वडियार ने मैसूर की गद्दी संभाली।

निष्कर्ष: एक ऐसी विरासत जो प्रेरित करती है

कृष्णराजा वोडेयार तृतीय का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक शक्ति का खोना किसी व्यक्ति की महानता का अंत नहीं होता। उन्होंने साबित कर दिया कि एक शासक अपनी प्रजा के दिलों पर राज कर सकता है, भले ही उसके सिर से ताज छीन लिया गया हो। वह एक ऐसे राजा थे जिन्होंने युद्ध के मैदान से ज्यादा सृजन के मैदान में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

उन्होंने मैसूर को एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत दी, जिसका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। साहित्य, संगीत, चित्रकला, वास्तुकला और यहाँ तक कि बोर्ड गेम्स के प्रति उनका जुनून उन्हें भारतीय इतिहास के अन्य शासकों से अलग, एक अनूठा स्थान देता है। उन्हें ‘अभिनव भोज’ (Abhinava Bhoja) और ‘कन्नड़ का भोज राजा’ (Bhoja Raja of Kannada) की उपाधियों से नवाजा गया।

वह टीपू सुल्तान के बाद मैसूर की गद्दी पर बैठे, एक ऐसे योद्धा के बाद जिनकी वीरता की गाथाएँ आज भी गाई जाती हैं। लेकिन कृष्णराजा वोडेयार तृतीय ने अपने साम्राज्य को तलवार से नहीं, बल्कि कला और संस्कृति से सींचकर एक अलग ही प्रकार की अमरता प्राप्त की। उनका जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक शक्ति सृजन में है, विनाश में नहीं।

आपको कृष्णराजा वोडेयार तृतीय के जीवन का कौन सा पहलू सबसे प्रेरणादायक लगा? कला के प्रति उनका समर्पण या अंग्रेजों के सामने उनका धैर्य? नीचे कमेंट में हमसे साझा करें!


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