नमस्कार, इतिहास प्रेमियों! स्वागत है आपका hindiindian.in के एक विशेष लेख में। आज हम बात करेंगे मैसूर के उस महानतम शासक की, जिसे उसकी प्रजा ‘राजर्षि’ (राजा और ऋषि) के नाम से पुकारती थी। हम बात कर रहे हैं महाराजा कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ (Krishnaraja Wodeyar IV) की, जिन्हें नालवाडी कृष्णराज वडियार के नाम से भी जाना जाता है।
उनका शासनकाल (1902-1940) मैसूर के इतिहास का स्वर्णिम युग माना जाता है। यह वह दौर था जब मैसूर न केवल भारत की सबसे प्रगतिशील और सुशासित रियासत बना, बल्कि शिक्षा, उद्योग, कला और साहित्य के क्षेत्र में भी उसने अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित किया। आइए, इस महान शासक के जीवन की विस्तृत यात्रा पर चलें और जानें कि कैसे उन्होंने मैसूर को एक आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया।
प्रस्तावना: इतिहास के एक आदर्श शासक की कहानी
भारतीय इतिहास में प्राचीन काल से लेकर मध्यकालीन भारत तक अनेक महान शासक हुए। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद जो क्षेत्रीय राज्य उभरे, उनमें मराठा साम्राज्य और मैसूर राज्य प्रमुख थे। वोडेयार वंश ने लगभग छह शताब्दियों तक मैसूर पर शासन किया। यदुराया वोडेयार से शुरू होकर हिरिय बेट्टड़ चामराजा वोडेयार प्रथम, तिम्मराजा वोडेयार प्रथम, चामराजा वोडेयार द्वितीय, चामराजा वोडेयार तृतीय, तिम्मराजा वोडेयार द्वितीय, चामराजा वोडेयार चतुर्थ, राजा वोडेयार प्रथम, चामराजा वोडेयार पंचम, राजा वोडेयार द्वितीय, कंठीरव नरसराज प्रथम, दोड्डा देवराजा वोडेयार, चिक्क देवराजा वोडेयार, कंठीरव नरसराज द्वितीय, दोड्डा कृष्णराजा वोडेयार प्रथम, चामराजा वोडेयार षष्ठम्, कृष्णराजा वोडेयार द्वितीय, हैदर अली, टीपू सुल्तान, कृष्णराजा वोडेयार तृतीय, चामराजेंद्र वडियार दशम और फिर कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ ने इस वंश की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया।
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ को ‘राजर्षि’ की उपाधि से विभूषित किया गया। यह उपाधि उन्हें महात्मा गांधी ने उनके सादगीपूर्ण जीवन, कर्तव्यपरायणता और प्रजा के प्रति अटूट प्रेम के लिए दी थी। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रतीक है कि एक संवैधानिक शासक कैसे अपने राज्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकता है।
अध्याय 1: प्रारंभिक जीवन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जन्म और परिवार
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ का जन्म 4 जून 1884 को मैसूर के राजमहल में हुआ था। वे महाराजा चामराजेंद्र वडियार दशम और महारानी केम्पा नंजा अम्मानी अवरु के सबसे बड़े पुत्र थे। उनके छोटे भाई का नाम युवराज कंठीरव नरसिंहराज वडियार था। उनका जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब उनके पिता ने मैसूर को ब्रिटिश शासन से वापस लेकर उसे एक प्रगतिशील रियासत के रूप में स्थापित करने की नींव रखी थी।
बचपन और शिक्षा
कृष्णराजा का बचपन बेहद अनुशासन और देखभाल में बीता। चूंकि वे राजगद्दी के उत्तराधिकारी थे, इसलिए उनकी शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्हें कन्नड़, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषाओं का ज्ञान कराया गया। साथ ही, उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाजी और राजनीति शास्त्र की शिक्षा भी दी गई। उनके शिक्षकों में प्रसिद्ध विद्वान और प्रशासक शामिल थे। उनकी दादी, महारानी केम्पा नंजा अम्मानी अवरु का उनके जीवन और शिक्षा पर गहरा प्रभाव था।
पिता का असामयिक निधन और रीजेंसी
दुर्भाग्यवश, कृष्णराजा मात्र 10 वर्ष के थे जब 1894 में उनके पिता चामराजेंद्र वडियार दशम का असामयिक निधन हो गया। चूंकि वे नाबालिग थे, इसलिए राज्य का प्रशासन उनकी माता महारानी केम्पा नंजा अम्मानी अवरु की अध्यक्षता में एक रीजेंसी परिषद (Regency Council) के हाथों में चला गया। इस परिषद ने 1902 तक शासन संभाला, जब तक कि युवा राजा वयस्क नहीं हो गए। इस अवधि के दौरान, उन्होंने राजकाज की बारीकियों को करीब से सीखा और एक योग्य शासक बनने की तैयारी की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक प्रगतिशील रियासत की नींव
कृष्णराजा चतुर्थ ने जब शासन संभाला, तब तक मैसूर एक सुशासित और प्रगतिशील रियासत के रूप में उभर चुका था। उनके दादा कृष्णराजा वोडेयार तृतीय ने 50 वर्षों के ब्रिटिश शासन के बाद मैसूर की वापसी की नींव रखी थी। उनके पिता चामराजेंद्र वडियार दशम ने 1881 में मैसूर की बहाली के बाद प्रशासनिक सुधार, शिक्षा के प्रसार और आधुनिकीकरण की जो नींव रखी, उस पर अब एक भव्य भवन खड़ा होना था।
अध्याय 2: सिंहासनारोहण और प्रारंभिक शासनकाल
राज्याभिषेक (1902)
8 फरवरी 1902 को, 18 वर्ष की आयु में, कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ का भव्य राज्याभिषेक हुआ। इस अवसर पर पूरे मैसूर में उत्सव का माहौल था। उनके राज्याभिषेक के साथ ही मैसूर के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई।
एक दूरदर्शी दीवान: सर एम. विश्वेश्वरैया
कृष्णराजा की सबसे बड़ी कुशलता यह थी कि उन्होंने अपने लिए अत्यंत योग्य और प्रतिभाशाली सहयोगियों का चयन किया। इस श्रृंखला में सबसे प्रमुख नाम था – सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (Sir M. Visvesvaraya)। वे 1912 से 1918 तक मैसूर के दीवान (प्रधानमंत्री) रहे। विश्वेश्वरैया एक अभियंता, दूरदर्शी प्रशासक और योजनाकार थे। उनके और कृष्णराजा के बीच अद्भुत तालमेल था। इस जोड़ी ने मैसूर को औद्योगिक और आर्थिक विकास के नए आयाम दिए।
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ के शासनकाल में अन्य प्रमुख दीवानों में पी.एन. कृष्णमूर्ति, सर अलबन बंजी और मिर्जा इस्माइल शामिल थे। उन्होंने हर क्षेत्र में विशेषज्ञों को नियुक्त किया और उन्हें कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी।
अध्याय 3: प्रशासनिक सुधार और आर्थिक विकास
आर्थिक नीतियाँ और औद्योगीकरण
कृष्णराजा चतुर्थ और सर एम. विश्वेश्वरैया ने मिलकर मैसूर के औद्योगीकरण की नींव रखी। उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ थीं:
- मैसूर आर्थिक सम्मेलन (Mysore Economic Conference) की स्थापना (1911): यह भारत में अपनी तरह की पहली संस्था थी, जिसका उद्देश्य राज्य के आर्थिक विकास के लिए नीतियाँ बनाना और उन्हें लागू करना था। यह एक प्रकार का आर्थिक नियोजन बोर्ड था, जो देश की स्वतंत्रता से कई दशक पहले स्थापित किया गया।
- बड़े पैमाने पर उद्योगों की स्थापना:
- भद्रावती लोहा और इस्पात कारखाना (Bhadravathi Iron and Steel Works): 1923 में स्थापित यह कारखाना भारत के महत्वपूर्ण इस्पात संयंत्रों में से एक बना।
- कृष्णराजसागर बाँध (Krishnarajasagara Dam) और जलविद्युत परियोजना: कावेरी नदी पर बना यह भव्य बाँध उनके नाम पर ही ‘कृष्णराजसागर’ कहलाया। इससे न केवल सिंचाई की सुविधा हुई, बल्कि विद्युत उत्पादन से पूरे राज्य को रोशनी मिली।
- मैसूर सैंडल सोप फैक्टरी (Mysore Sandal Soap Factory) और मैसूर केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स फैक्टरी: इन उद्योगों ने मैसूर के औद्योगिक विकास को गति दी और रोजगार के अवसर पैदा किए।
- भद्रावती लोहा और इस्पात कारखाना (Bhadravathi Iron and Steel Works): 1923 में स्थापित यह कारखाना भारत के महत्वपूर्ण इस्पात संयंत्रों में से एक बना।
बैंकिंग और वित्तीय सुधार
- बैंक ऑफ मैसूर (Bank of Mysore) का विस्तार: 1882 में स्थापित इस बैंक को और मजबूत किया गया।
- सहकारी समितियों को बढ़ावा: किसानों और कारीगरों को सस्ता ऋण उपलब्ध कराने के लिए सहकारी समितियों के गठन को प्रोत्साहित किया गया।
अध्याय 4: शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान
शिक्षा का सार्वभौमिक प्रसार
कृष्णराजा चतुर्थ का मानना था कि शिक्षा ही सच्ची प्रगति की कुंजी है। उनके शासनकाल में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ।
- प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य: 1913 में, उन्होंने पूरे राज्य में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम उठाए। यह भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास था।
- प्रौढ़ शिक्षा पर जोर: वयस्कों के लिए शिक्षा कार्यक्रम शुरू किए गए।
- उच्च शिक्षा का स्वर्णिम काल:
- मैसूर विश्वविद्यालय (Mysore University) की स्थापना (1916): यह भारत का पहला विश्वविद्यालय था जो किसी रियासत (Princely State) द्वारा स्थापित किया गया था। आज यह देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में गिना जाता है।
- महाराजा कॉलेज और महारानी कॉलेज को उच्च शिक्षा के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित किया गया।
- तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इंजीनियरिंग स्कूल (जो आज UVCE है) को और सशक्त बनाया गया।
- मैसूर विश्वविद्यालय (Mysore University) की स्थापना (1916): यह भारत का पहला विश्वविद्यालय था जो किसी रियासत (Princely State) द्वारा स्थापित किया गया था। आज यह देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में गिना जाता है।
लड़कियों की शिक्षा और सामाजिक सुधार
- उन्होंने लड़कियों की शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया। महारानी कॉलेज के अलावा कई बालिका विद्यालय खोले गए।
- बाल विवाह पर रोक लगाने और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाए गए।
- उन्होंने दलित वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए। उनके लिए शिक्षा के अवसर सुनिश्चित किए गए और उनके सामाजिक उत्थान के लिए कदम उठाए गए।
अध्याय 5: बुनियादी ढाँचे और शहरी विकास में योगदान
कृष्णराजसागर बाँध और बिंदविल
कृष्णराजसागर बाँध केवल एक सिंचाई परियोजना नहीं थी, बल्कि यह मैसूर के विकास का प्रतीक बन गया। इससे निकलने वाली नहरों ने मांड्या और आसपास के क्षेत्रों की भूमि को उपजाऊ बना दिया। साथ ही, बाँध के नीचे बने खूबसूरत बागीचे बिंदविल (Brindavan Gardens) आज भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।
सड़कें और रेलवे
उनके शासनकाल में सड़कों और रेलवे लाइनों का जाल बिछा। बैंगलोर को तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल से जोड़ने वाली रेलवे लाइनों का विस्तार हुआ। इससे व्यापार और आवागमन को बढ़ावा मिला।
बैंगलोर का विकास
कृष्णराजा चतुर्थ के शासनकाल में बैंगलोर (अब बेंगलुरु) शहर का तेजी से विकास हुआ।
- बैंगलोर विश्वविद्यालय के लिए भवन: केंद्रीय कॉलेज भवन जैसे कई ऐतिहासिक भवन इसी काल में बने।
- जल आपूर्ति और स्वच्छता: बैंगलोर शहर में पेयजल आपूर्ति और सीवरेज व्यवस्था को बेहतर बनाया गया।
- बस सेवा: 1930 के दशक में बैंगलोर में सार्वजनिक बस सेवा शुरू की गई।
अध्याय 6: सांस्कृतिक योगदान और कला-संरक्षण
कला और साहित्य के महान संरक्षक
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ अपने पूर्वजों की तरह ही कला और साहित्य के प्रेमी थे। उनके दरबार में कई विद्वान, कवि, चित्रकार और संगीतकार संरक्षण पाते थे।
- कन्नड़ साहित्य को बढ़ावा: उनके शासनकाल में कन्नड़ साहित्य का स्वर्णिम काल था। आर. नरसिंहाचार्य, डी.वी. गुंडप्पा, बी.एम. श्रीकंठैया, के.वी. पुट्टप्पा (कुवेम्पु) जैसे साहित्यकारों को प्रोत्साहन मिला।
- संगीत और नृत्य: उन्होंने कर्नाटक संगीत और नृत्य कलाओं को संरक्षण दिया। प्रसिद्ध संगीतज्ञ वीणा शेषण्णा और मैसूर टी. चौड़ैया उनके दरबार में रत्न थे।
- चित्रकला: उन्होंने मैसूर शैली की चित्रकला को बढ़ावा दिया। जगनमोहन पैलेस में आज भी इस काल के बेहतरीन चित्र देखे जा सकते हैं।
ऐतिहासिक भवन और स्मारक
- बैंगलोर पैलेस (Bangalore Palace) का जीर्णोद्धार और विस्तार उन्हीं के शासनकाल में हुआ।
- मैसूर पैलेस (Mysore Palace) का निर्माण उनके पिता चामराजेंद्र वडियार दशम ने शुरू कराया था, लेकिन इसका भव्य रूप कृष्णराजा चतुर्थ के शासनकाल में ही निखर कर सामने आया।
- ललिता महल (Lalitha Mahal) का निर्माण 1921 में वायसराय लॉर्ड रीडिंग के ठहरने के लिए कराया गया था।
अध्याय 7: व्यक्तिगत जीवन, व्यक्तित्व और आदर्श
सादगी और कर्तव्यपरायणता
कृष्णराजा चतुर्थ अपनी सादगी और कर्तव्यपरायणता के लिए प्रसिद्ध थे। वे प्रतिदिन सुबह 4 बजे उठ जाते थे और दिन की शुरुआत पूजा-पाठ से करते थे। उसके बाद वे राजकाज के कार्यों में जुट जाते थे। उनका जीवन बेहद अनुशासित था। वे शाकाहारी थे और उनका खान-पान बहुत सादा था।
प्रजा के प्रति प्रेम
उनका सबसे बड़ा गुण था अपनी प्रजा के प्रति अटूट प्रेम और करुणा। वे हमेशा जनता के दुख-दर्द को समझने का प्रयास करते थे। उन्होंने कभी भी अपने महल को जनता से दूर नहीं रखा। मैसूर के दशहरा उत्सव के दौरान वे आम जनता के बीच आते थे और उनके साथ उत्सव मनाते थे।
महात्मा गांधी से मुलाकात और ‘राजर्षि’ की उपाधि
1927 में, महात्मा गांधी ने मैसूर का दौरा किया और महाराजा से मुलाकात की। गांधीजी उनकी सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और प्रजा के प्रति समर्पण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ‘राजर्षि’ (Rajarshi) की उपाधि दी। इसका अर्थ है ‘राजा और ऋषि’ – एक ऐसा राजा जो ऋषि की तरह सादगी और त्याग का जीवन जीता है।
विवाह और परिवार
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ का विवाह 1900 में प्रताप कुमारी अम्मानी से हुआ था, जिन्हें बाद में महारानी लक्ष्मी देवी के नाम से जाना गया। दुर्भाग्यवश, उनकी कोई संतान नहीं थी। उनके छोटे भाई युवराज कंठीरव नरसिंहराज वडियार के पुत्र, जयचामराजेंद्र वडियार (Jayachamarajendra Wadiyar), उनके उत्तराधिकारी बने।
अध्याय 8: अंतिम वर्ष और मृत्यु
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ ने 1940 के दशक की शुरुआत तक शासन किया। लगभग 38 वर्षों के इस लंबे शासनकाल ने उनके स्वास्थ्य पर असर डाला। 1940 की गर्मियों में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। इसके बावजूद, उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन जारी रखा।
3 अगस्त 1940 को, महान शासक कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ का बैंगलोर के राजमहल में निधन हो गया। उनके निधन से पूरे मैसूर राज्य में गहरा शोक छा गया। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए। उनके बाद उनके भतीजे जयचामराजेंद्र वडियार मैसूर के अंतिम महाराजा बने।
अध्याय 9: विरासत और मूल्यांकन
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ को भारतीय इतिहास के सबसे आदर्श शासकों में गिना जाता है। उनकी विरासत आज भी जीवित है।
- एक आदर्श राज्य का निर्माण: उन्होंने मैसूर को भारत का सबसे प्रगतिशील, सुशासित और समृद्ध राज्य बनाया। उनके शासनकाल में मैसूर को ‘मॉडल राज्य’ (Model State) के रूप में जाना जाता था।
- शिक्षा और औद्योगिक विकास की नींव: उनके द्वारा स्थापित संस्थाएँ और शुरू की गई योजनाएँ आज भी कर्नाटक राज्य की प्रगति की रीढ़ हैं।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण: उन्होंने कला, साहित्य और संस्कृति को जो संरक्षण दिया, उससे कर्नाटक में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सूत्रपात हुआ।
- मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण: उनका संपूर्ण जीवन मानवीय मूल्यों, सेवा और कर्तव्य के प्रति समर्पण का प्रतीक था। वे सच्चे अर्थों में ‘राजर्षि’ थे।
उनके सम्मान में, बैंगलोर में कृष्णराजा बुलेवार्ड (K.R. Boulevard) और मैसूर में कृष्णराजसागर बाँध जैसे कई स्थल उनके नाम से जाने जाते हैं।
निष्कर्ष: एक ऐसी विरासत जो सदियों तक प्रेरित करती रहेगी
कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ का जीवन और कार्य हमें सिखाते हैं कि सच्ची महानता सत्ता के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि सेवा, कर्तव्य और मानवीय मूल्यों में निहित है। उन्होंने साबित कर दिया कि एक संवैधानिक शासक भी अपनी प्रजा के सपनों को साकार कर सकता है, यदि उसके पास दूरदर्शिता, ईमानदारी और समर्पण हो।
उनके नेतृत्व में मैसूर ने जो ऊंचाइयां छुईं, वह आज भी प्रशासकों और नीति-निर्माताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका मैसूर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि एक विचार था – एक ऐसे समाज का विचार जहाँ शिक्षा, समृद्धि और संस्कृति का विकास साथ-साथ होता है।
आपको कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ के जीवन का कौन सा पहलू सबसे प्रेरणादायक लगा? उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों ने आधुनिक कर्नाटक को कैसे प्रभावित किया? नीचे कमेंट में हमसे साझा करें!