हिंदी इंडियन के इस विशेष लेख में, आपका स्वागत है। भारतीय इतिहास के मध्यकालीन दौर में, मुग़ल साम्राज्य ने एक अमिट छाप छोड़ी है। इस साम्राज्य के शासकों में औरंगज़ेब का नाम एक ऐसे चरित्र के रूप में उभरता है, जिस पर इतिहासकार आज भी बहस करते हैं। क्या वह एक कट्टर धार्मिक उन्मादी था? या फिर एक कुशल प्रशासक और न्यायप्रिय सम्राट? यह लेख औरंगज़ेब के जीवन, उसके शासनकाल के महत्वपूर्ण पहलुओं, और उसकी जटिल विरासत पर एक गहरी नज़र डालता है।
प्रस्तावना: एक विभाजनकारी विरासत

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब, जिसे दुनिया औरंगज़ेब के नाम से जानती है, भारत के इतिहास के सबसे शक्तिशाली लेकिन सबसे विवादास्पद शासकों में से एक है। वह मुग़ल साम्राज्य का छठा बादशाह था और उसने 1658 से 1707 तक, लगभग 49 वर्षों तक शासन किया। उसके शासनकाल में मुग़ल साम्राज्य अपने भौगोलिक विस्तार के शिखर पर पहुँच गया, लेकिन साथ ही वह आर्थिक और प्रशासनिक संकटों का सामना करने लगा। औरंगज़ेब को उसकी कट्टर इस्लामिक नीतियों, हिंदू मंदिरों को तोड़ने, और गैर-मुसलमानों पर जज़िया कर फिर से लगाने के लिए याद किया जाता है। वहीं, उसकी व्यक्तिगत तपस्या, न्याय के प्रति commitment, और असीम ambition ने उसे एक रहस्यमयी और जटिल व्यक्तित्व बना दिया है। अपने पिता शाहजहाँ के भव्य और कला-प्रेमी शासन के बाद, औरंगज़ेब का युग एक कठोर और नीरस मोड़ की तरह था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (1618-1658)

जन्म और वंश
औरंगज़ेब का जन्म 3 नवंबर, 1618 को दाहोद, गुजरात में हुआ था। वह शाहजहाँ और उनकी फारसी पत्नी मुमताज महल की तीसरी संतान था। मुमताज महल की मृत्यु अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय हुई थी, जिसके बाद शाहजहाँ ने उनकी याद में दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत, ताजमहल बनवाया। औरंगज़ेब का जन्म उस समय हुआ था जब उसके दादा जहाँगीर का शासनकाल चल रहा था और उसके पिता शाहजहाँ एक शहजादे के रूप में साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों का प्रशासन संभाल रहे थे।
शिक्षा-दीक्षा और सैन्य प्रशिक्षण
दरबारी परंपरा के अनुसार, औरंगज़ेब को बचपन से ही उच्चकोटि की शिक्षा दी गई। उसे अरबी, फारसी और तुर्की भाषाओं में निपुण बनाया गया। इस्लामिक धर्मशास्त्र और कानून (फिक़्ह) की गहन शिक्षा उसे मिली, जिस पर उसने अपना पूरा जीवन अमल किया। उसके शिक्षकों में प्रसिद्ध विद्वान मीर मुहम्मद बाकिर और सादिक़ हैदर शामिल थे। साथ ही, उसे घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और युद्ध कला में भी पारंगत किया गया। उसके अंदर बचपन से ही एक गंभीर, अनुशासित और महत्वाकांक्षी स्वभाव झलकता था, जो उसके भाइयों, विशेषकर उदार और कलाप्रेमी दारा शिकोह से बिल्कुल अलग था।
प्रारंभिक प्रशासनिक अनुभव
शाहजहाँ ने अपने सभी बेटों को युवावस्था में ही साम्राज्य के विभिन्न सूबों (प्रांतों) का गवर्नर नियुक्त किया, ताकि वे शासन का अनुभव प्राप्त कर सकें।
- 1636: मात्र 18 वर्ष की आयु में, उसे दक्खिन (दक्षिण भारत) का सूबेदार बनाया गया। यहाँ उसे पहली बार बीजापुर और गोलकुंडा जैसी शक्तिशाली दक्खिन सल्तनतों और मराठा शक्ति से सामना हुआ।
- 1645-1652: इस दौरान उसे गुजरात, बल्ख (अफगानिस्तान) और मुल्तान जैसे महत्वपूर्ण प्रांतों की जिम्मेदारी दी गई। इन पदों पर रहते हुए उसने अपनी सैन्य और प्रशासनिक क्षमता साबित की।
उत्तराधिकार का संघर्ष (War of Succession)
मुग़ल परंपरा में उत्तराधिकार के लिए युद्ध एक आम बात थी, जैसा कि हुमायूँ और अकबर के समय में भी देखने को मिला था। 1657 में शाहजहाँ के बीमार पड़ने की खबर ने उत्तराधिकार के संघर्ष को भड़का दिया। शाहजहाँ के चार बेटे थे:
- दारा शिकोह: सबसे बड़ा और शाहजहाँ का चहेता बेटा। वह एक उदारवादी सूफी विचारक था और हिंदू-मुस्लिम एकता में विश्वास रखता था।
- शाह शुजा: बंगाल का गवर्नर।
- औरंगज़ेब: दक्खिन का गवर्नर।
- मुराद बख्श: गुजरात का गवर्नर। वह एक बहादुर लेकिन अय्यर और शराबी शहजादा था।
इस संघर्ष में कई निर्णायक लड़ाइयाँ हुईं:
- धरमट का युद्ध (अप्रैल 1658): औरंगज़ेब और मुराद बख्श की संयुक्त सेना ने शाह शुजा और महाराजा जसवंत सिंह की सेना को हराया।
- सामूगढ़ का युद्ध (29 मई, 1658): यह सबसे निर्णायक युद्ध था। औरंगज़ेब ने दारा शिकोह की विशाल सेना को चालाकी और बेहतर रणनीति से परास्त किया। दारा भाग गया लेकिन बाद में पकड़ा गया और उसकी हत्या कर दी गई।
- बाद में: औरंगज़ेब ने अपने सहयोगी मुराद बख्श को कैद कर लिया और बाद में उसकी भी हत्या करवा दी। शाह शुजा को भगा दिया गया।
जुलाई 1658 में, औरंगज़ेब ने आगरा पर कब्जा कर लिया और अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर लिया। शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम 8 वर्ष आगरा के किले में नजरबंद रहकर बिताए। 31 जुलाई, 1658 को औरंगज़ेब ने “आलमगीर” (विश्व-विजेता) की उपाधि धारण करके खुद को बादशाह घोषित कर दिया। आधिकारिक तौर पर उसका राज्याभिषेक 5 जून, 1659 को हुआ।
शासनकाल: नीतियाँ, विस्तार और विद्रोह (1658-1707)

औरंगज़ेब का लगभग पाँच दशक लंबा शासनकाल अत्यंत घटनापूर्ण रहा। उसकी नीतियों ने न केवल मुग़ल साम्राज्य को आकार दिया बल्कि भारत के भविष्य के इतिहास की दिशा भी तय की।
धार्मिक नीतियाँ: विवाद का केंद्रबिंदु
औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियाँ उसकी विरासत पर सबसे गहरा धब्बा मानी जाती हैं। उसने अपने पूर्वज अकबर की सुलह-ए-कुल (सर्व-धर्म शांति) की नीति को पूरी तरह से त्याग दिया।
- जज़िया कर का पुनः लागू करना (1679): यह औरंगज़ेब का सबसे विवादास्पद कदम था। जज़िया एक ऐसा कर था जो गैर-मुसलमानों (जिम्मियों) से उनकी सुरक्षा के बदले लिया जाता था। अकबर ने इस कर को समाप्त कर दिया था। औरंगज़ेब ने इसे फिर से लागू किया, जिससे हिंदू, सिख और अन्य गैर-मुस्लिम communities में भारी रोष पैदा हुआ। इसके पीछे उसका उद्देश्य इस्लामिक कानून को लागू करना और राजकोष की आमदनी बढ़ाना था।
- मंदिरों का विध्वंस: औरंगज़ेब ने कई प्रमुख हिंदू मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए। इनमें शामिल हैं:
- विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी (1669)
- केशवराय मंदिर, मथुरा (1670)
- सोमनाथ मंदिर का पुनः विध्वंस
- इन कार्यों के पीछे तर्क दिया जाता है कि यह विद्रोही जमींदारों को दंड देने या “शिर्क” (मूर्तिपूजा) रोकने की नीति का हिस्सा था। हालाँकि, उसने कई हिंदू मंदिरों को दान भी दिया, जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर के पास ज्ञानवापी मस्जिद बनवाने के बावजूद उसने बनारस के कई अन्य मंदिरों को land grants दिए।
- विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी (1669)
- इस्लामिक कानून (शरिया) को बढ़ावा: उसने हदीसों के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। इस्लामिक त्योहारों को राजकीय संरक्षण मिला। उसने सिक्कों पर कलमा (इस्लामic declaration of faith) खुदवाया।
- गैर-मुस्लिमों पर प्रतिबंध: उसने हिंदू मेलों और त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया। हिंदू धर्म प्रचारकों को दरबारी पदों से हटाया गया, हालाँकि उसके दरबार में कई हिंदू राजपूत और मराठा अभी भी उच्च पदों पर थे, जैसे राजा जसवंत सिंह और छत्रसाल बुंदेला।
प्रशासनिक और आर्थिक नीतियाँ
अपनी धार्मिक कट्टरता के बावजूद, औरंगज़ेब एक कुशल और मेहनती प्रशासक था।
- केंद्रीकरण: उसने शासन का और अधिक केंद्रीकरण किया और सूबेदारों की शक्ति पर नज़र रखी।
- न्याय प्रणाली: वह स्वयं न्याय करने में बहुत रुचि लेता था और अक्सर लोगों की शिकायतें सुनता था। उसे “न्याय का फरिश्ता” कहा जाता था।
- राजस्व प्रणाली: उसने भू-राजस्व (खराज) की दरें बढ़ा दीं, जिससे किसानों में असंतोष फैला।
- सादगी: उसने दरबार के भव्य और अपव्ययी रिवाजों को समाप्त कर दिया। उसने संगीत, चित्रकला और नृत्य जैसी ललित कलाओं को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया, क्योंकि वह उन्हें इस्लाम के अनुरूप नहीं मानता था।
सैन्य अभियान और साम्राज्य का विस्तार
औरंगज़ेब का शासनकाल लगभग निरंतर युद्धों में बीता। उसने मुग़ल साम्राज्य को उसके अब तक के सबसे बड़े geographical extent तक पहुँचाया।
उत्तर-पश्चिमी सीमा
- अफगान विद्रोह: उसने यूसुफजई और अफरीदी पठानों के विद्रोहों को कुचला। उसने अपने बेटे अकबर की बगावत (1681) को भी दबाया, जिसने पठानों के साथ मिलकर विद्रोह किया था।
राजपूतों के साथ संघर्ष (1679-1707)
राजपूत मुग़ल साम्राज्य के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे थे, लेकिन औरंगज़ेब की नीतियों ने इस रिश्ते में दरार पैदा कर दी।
- कारण: मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह की 1678 में मृत्यु हो गई। औरंगज़ेब ने मारवाड़ पर कब्जा कर लिया क्योंकि कोई सीधा उत्तराधिकारी नहीं था। जसवंत सिंह की विधवा रानियों ने एक पुत्र को जन्म दिया, अजीत सिंह। औरंगज़ेब ने अजीत सिंह को मारवाड़ का शासक मानने से इनकार कर दिया और उसे मुसलमान बनाने की कोशिश की।
- युद्ध: इससे मेवाड़ के राणा राज सिंह ने मारवाड़ का साथ दिया और औरंगज़ेब के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। यह युद्ध लंबा चला और मुग़लों के लिए बेहद खर्चीला साबित हुआ। अंततः मुग़लों ने मारवाड़ और मेवाड़ पर नियंत्रण तो कर लिया, लेकिन राजपूतों का विश्वास हमेशा के लिए टूट गया।
दक्खिन अभियान और मराठों का उदय
यह औरंगज़ेब के शासनकाल का सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय था, जिसने अंततः मुग़ल साम्राज्य की नींव हिला दी।
- बीजापुर और गोलकुंडा सल्तनतों का पतन (1686-1687): औरंगज़ेब ने दक्खिन की शिया मुस्लिम सल्तनतों, बीजापुर और गोलकुंडा, को जीतने का फैसला किया। उसने उन पर इस्लाम के दुश्मन होने का आरोप लगाया। उसने बीजापुर (1686) और गोलकुंडा (1687) पर कब्जा कर लिया और उन्हें मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया।
- शिवाजी और मराठा साम्राज्य: इस पूरे दौरान, औरंगज़ेब का सबसे बड़ा विरोधी छत्रपति शिवाजी महाराज थे। शिवाजी ने एक शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य की स्थापना की और मुग़लों के लिए लगातार सिरदर्द बने रहे।
- 1666 में आगरा में शिवाजी की कैद और भागने की घटना औरंगज़ेब के लिए एक बड़ा अपमान थी।
- शिवाजी की 1680 में मृत्यु के बाद, औरंगज़ेब ने सोचा कि मराठा शक्ति कमजोर हो जाएगी, लेकिन शिवाजी के उत्तराधिकारी संभाजी और फिर राजाराम ने संघर्ष जारी रखा।
- संभाजी की हत्या (1689): औरंगज़ेब की सेना ने संभाजी को पकड़ लिया और उन्हें यातना देकर मार डाला। यह एक भारी रणनीतिक गलती साबित हुई, क्योंकि इससे मराठों में और रोष भर गया और उन्होंने औरंगज़ेब के खिलाफ छापामार युद्ध (गुरिल्ला वारफेयर) तेज कर दिया।
- 1666 में आगरा में शिवाजी की कैद और भागने की घटना औरंगज़ेब के लिए एक बड़ा अपमान थी।
औरंगज़ेब ने अपने जीवन के अंतिम 26 वर्ष दक्षिण भारत में ही बिताए, लगातार मराठों से लड़ते हुए। मराठे अब एक राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन बन चुके थे। यह लंबा युद्ध मुग़ल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति के लिए एक नाली साबित हुआ।
सिखों के साथ संघर्ष
- गुरु तेग बहादुर की शहादत (1675): औरंगज़ेब ने कश्मीरी पंडितों की रक्षा करने से इनकार करने और इस्लाम कबूल न करने पर गुरु तेग बहादुर को दिल्ली में शहीद कर दिया। इस घटना ने सिख समुदाय को औरंगज़ेब के खिलाफ कर दिया।
- गुरु गोबिंद सिंह: गुरु तेग बहादुर के पुत्र गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की और औरंगज़ेब की सेनाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनके दो बेटों को औरंगज़ेब के सूबेदार वज़ीर खान ने दीवार में चुनवा कर शहीद कर दिया। इसने सिखों और मुग़लों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया।
महत्वपूर्ण व्यक्तित्व औरंगज़ेब के दरबार में
- जय सिंह प्रथम (मिर्जा राजा): आमेर के राजा, औरंगज़ेब के एक कमांडर, जिन्होंने शिवाजी को आगरा बुलाने में अहम भूमिका निभाई।
- जसवंत सिंह: मारवाड़ के महाराजा, जो शुरू में औरंगज़ेब के विश्वासपात्र थे लेकिन बाद में उनके रिश्ते बिगड़ गए।
- दिलेर खान: एक क्रूर और निर्मम मुग़ल जनरल, जिसने दक्खिन अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- रोशन आरा बेगम: औरंगज़ेब की बहन, जिसपर उसके भाईयों के बीच राजनीतिक प्रभाव रखने का आरोप था।
- ज़ेबुन्निसा: औरंगज़ेब की सबसे बड़ी बेटी, एक विदुषी और कवयित्री, जिसे बाद में औरंगज़ेब ने ही कैद कर लिया।
औरंगज़ेब की मृत्यु और साम्राज्य का पतन

3 मार्च, 1707 को, 88 वर्ष की उम्र में, अहमदनगर, दक्खिन में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पहले, उसने अपने पुत्रों के नाम एक पत्र लिखा, जिसमें उसने अपने जीवन के अंतिम दिनों में पश्चाताप की भावना जताई। उसे औरंगाबाद (खुलदाबाद) में एक साधारण कब्र में दफनाया गया, जो उसकी सादगीपूर्ण जीवनशैली के अनुरूप था।
औरंगज़ेब की मृत्यु के साथ ही मुग़ल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। उसके बाद के शासक – बहादुर शाह I, जहाँदार शाह, फर्रुखसियर, मुहम्मद शाह आदि – कमजोर और अयोग्य साबित हुए। औरंगज़ेब की नीतियों ने जो असंतोष पैदा किया था, वह फूट पड़ा। मराठे, सिख, और राजपूत शक्तिशाली होते गए और केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ गई। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक, मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर महज एक नाममात्र का शासक रह गया था।
निष्कर्ष: औरंगज़ेब की ऐतिहासिक विरासत

औरंगज़ेब आलमगीर भारतीय इतिहास का एक ऐसा चरित्र है जिसे एक ही साथ सफल और असफल दोनों ही कहा जा सकता है। वह एक कुशल प्रशासक, एक निडर सैनिक, और एक अनुशासित व्यक्ति था, जिसने अपने व्यक्तिगत जीवन में विलासिता को कभी स्थान नहीं दिया। उसने साम्राज्य को अपने चरम विस्तार तक पहुँचाया।
लेकिन दूसरी ओर, उसकी संकीर्ण धार्मिक नीतियों ने साम्राज्य की बहुलवादी संस्कृति को गहरा झटका पहुँचाया। राजपूतों जैसे पुराने सहयोगियों को दूर कर दिया, और मराठों और सिखों जैसे नए शक्तिशाली दुश्मन पैदा कर दिए। उसका अंतहीन दक्खिन अभियान मुग़ल खजाने के लिए घातक साबित हुआ। कहा जा सकता है कि औरंगज़ेब ने एक विशाल साम्राज्य विरासत में छोड़ा, लेकिन वह एक ऐसा साम्राज्य था जो आंतरिक रूप से खोखला और टूटने के कगार पर खड़ा था।
उसकी विरासत आज भी बहस का विषय बनी हुई है। कुछ उसे एक पवित्र संत की तरह देखते हैं, तो कुछ के लिए वह एक कट्टर तानाशाह है। सच तो यह है कि औरंगज़ेब का चरित्र इन दोनों ही छवियों के बीच कहीं मौजूद है।
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