हुमायूँ (नासिर-उद-दीन मुहम्मद हुमायूँ) मुग़ल बादशाह बाबर के पुत्र और दूसरे मुग़ल सम्राट थे। उनका जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) में हुआ था। 26 दिसंबर 1530 को बाबर की मृत्यु के बाद वे केवल 22 वर्ष की आयु में दिल्ली की गद्दी पर बैठ गए। हुमायूँ की कहानी यद्यपि विजयों से नहीं भरी रही, पर उनके शासनकाल में कई बड़े संघर्ष और ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं। शुरुआती वर्षों में उन्होंने कालिंजर पर आक्रमण किया और गुजरात-मालवा पर विजय प्राप्त की, लेकिन उन्हें दृढ़ नहीं बना सके। बाद में अफ़ग़ानों के सरदार शेर शाह सूरी से उनकी टक्कर हुई, जिसमें हुमायूँ को चौंसा (1539) और बिलग्राम (1540) की निर्णायक लड़ाइयों में पराजय का सामना करना पड़ा। इन हारों के बाद उन्हें लाहौर छोड़कर भागना पड़ा और अंततः जुलाई 1543 में शरण पाने के लिए फारस चले गए। बाद में शाह तहमास्प प्रथम की मदद से 1555 में उन्होंने फिर से दिल्ली और आगरा पर अधिकार किया। लेकिन 27 जनवरी 1556 को दिल्ली के शेरमंदल महल में हुए एक दर्दनाक हादसे में उनकी मृत्यु हो गई।
प्रारंभिक जीवन और परिवार

बाबर के सत्ता में आते ही हुमायूँ का परिवार भी मुग़ल इतिहास के केंद्र में आ गया। वे बाबर के पसंदीदा सम्राज महम बेगम के पुत्र थे। उनके बड़े भाई हिंदाल मिर्जा काबुल पर शासन करते थे, जबकि छोटे भाई कमरान मिर्जा ने लाहौर पर अधिकार किया था। गद्दी संभालने पर हुमायूँ अनुभवी नहीं थे, लेकिन बाबर द्वारा विरासत में मिले क्षेत्रीय अधिकार उन्होंने संभालने की कोशिश की। बाबर ने अपनी मृत्यु से पहले अपने साम्राज्य को आधे-आधे भागों में बांट दिया था, इसलिए हुमायूँ के उत्थान के समय उनके भाईयों के बीच सत्ता संघर्ष की स्थिति थी।
बाबर (दाएँ) और उनके बेटे हुमायूँ (बाएँ), लगभग 1640 ई. की मुग़ल शैली की पेंटिंग (बाबर-हुमायूँ परिवार का चित्र)
शासनारोहण और शुरुआती विजय
26 दिसंबर 1530 को बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ ने दिल्ली का सिंहासन संभाला। उनके शुरुआती अभियान अपेक्षाकृत सफल रहे: कलिंगर (1531) पर आक्रमण किया, बंगलादेश के सुलतान के साथ गठबंधन किया और गुजरात व मालवा पर विजय प्राप्त की। इन सफलताओं के दौरान उन्होंने चम्पानेर और मंडू जैसे किलों को भी अपने अधीन कर लिया। हालांकि, जैसे ही हुमायूँ बंगाल गया, कानपुर के पास चौंसा में शेर शाह सूरी से वह जंग हुआ, जिसमें हुमायूँ को हार मिली।
शेर शाह सूरी से संघर्ष और निर्वासन

शेर शाह सूरी, जो एक कुशल अफ़ग़ान सेनानी था, ने हुमायूँ को दो बार बड़ी लड़ाइयों में पराजित किया। पहली बार जून 1539 में चौंसा के युद्ध में हुमायूँ हार गया। इसके बाद वह अगरा को छोड़कर औंगना के निकट बिलग्राम चला गया जहाँ फिर से शेर शाह से हार कर उसे लाहौर भागना पड़ा। इन युद्धों के बीच में गुजरात और मालवा में भी उसे धक्का लगा और उसका साम्राज्य अस्थिर हो गया। हार के बाद हुमायूँ अपनी जान बचाकर सिंध की तरफ चला गया और अंततः 1543 में सुरक्षा की तलाश में शाह तहमास्प के दरबार में पहुंचा। फारस में शरण पाने पर उन्होंने इस्लाम धर्म के शिया संप्रदाय में सामयिक रूप से परिवर्तन किया और साथ ही कंधार उन्हें सौंपने की शर्त रखी गई। फारसी सेना की सहायता से 1555 में हुमायूँ ने भारत वापसी की।
निर्वासन से पुनर्स्थापना

फारस से लौटकर हुमायूँ ने कंधार और काबुल अपने भाइयों से छीनकर अपनी स्थिति मजबूत की। दिसंबर 1554 में उसने सिंधु नदी पार कर लाहौर पर कब्जा किया। अगले ही फ़रवरी में उसने बिना किसी लड़ाई के लाहौर संभाल लिया। जुलाई 1555 में उसने सिरहिंद पर अधिकार किया और दिल्ली तथा आगरा की मुहर लगाई। इस तरह लगभग 12 वर्षों बाद वह पुनः दिल्ली के बादशाह बन गया। हालांकि मुग़ल साम्राज्य फिर से संपूर्ण नहीं हो पाया, लेकिन यह महत्वपूर्ण था कि बाबर द्वारा स्थापित विरासत को जीवित रखता हुआ हुमायूँ वापस लौटा।
प्रशासन, संस्कृति और वास्तुकला

हुमायूँ के शासनकाल में मुग़ल दरबार पर फारसी प्रभाव गहरा हुआ। फारस से लाए गए विद्वानों और कलाकारों ने मुग़ल दरबार की संस्कृति को प्रभावित किया। मुग़ल स्थापत्य कला में हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली) एक मील का पत्थर है।
दिल्ली का हुमायूँ का मकबरा, जिसे उनकी प्रमुख पत्नी हाजी बेगम ने 1562–71 में बनवाया। यह मुग़ल वास्तुकला का पहला भव्य चारबाग़ स्तरीय मकबरा था।
मकबरे का निर्माण हाजी बेगम (बेगा बेगम) ने शुरू कराया और इसे 1565-1571 में पूरा किया। यह लाल बलुआ पत्थर और सफ़ेद संगमरमर का संयोजन है, जो आगरा का ताजमहल बनने से लगभग सौ साल पहले बना था। हुमायूँ के मकबरे की डिज़ाइन ने बाद में बने कई मुग़ल मकबरों के लिए नमूना पेश किया। इसके अलावा, हुमायूँ के समय कई मस्जिदें और किले बनाए गए; शाहजहाँबाद (दिल्ली) में उसके द्वारा कई इमारतों की नींव रखी गई। हालांकि हुमायूँ स्वयं महत्त्वपूर्ण लेखन छोड़ कर नहीं गए, उनके बेटे अकबर ने उनके नाम पर ‘हुमायूँनामा’ तैयार करवाया जो उनकी जीवनी है।
परिवार और उत्तराधिकारी

हुमायूँ की मुख्य पत्नी बेगा बेगम (महम बेगम) थीं, जिन्होंने मकबरा बनवाया। हुमायूँ की अन्य महत्वपूर्ण पत्नी में हामिदा बनू बेगम थीं, जिनसे अकबर का जन्म हुआ। हुमायूँ के कई पुत्र थे, जिनमें अकबर (1542–1605) और मिर्ज़ा मुहम्मद हाकिम (1553–85) प्रमुख हैं। अपने निधन के समय अकबर एक बालक था, अतः सत्ता में बीरबल खान (बैरम खान) की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
प्रमुख घटनाएँ (टीमलाइन)

- 1508: हुमायूँ का जन्म – 6 मार्च 1508, काबुल।
- 1530: बाबर की मृत्यु और हुमायूँ का दिल्ली पर अधिकार – 26 दिसंबर।
- 1535: गुजरात-विजय – मालवा और गुजरात के कई किले जीते।
- 1539: चौंसा की लड़ाई – शेर शाह सूरी से करारी हार।
- 1540: बिलग्राम की हार – लाहौर भागे और अपने अधिकांश राज्यों को खो दिया।
- 1543: फारस का निर्वासन – शाह तहमास्प की शरण ली।
- 1555: पुनर्स्थापना – फारसी सेना सहायता से दिल्ली और आगरा जीते।
- 1556: मृत्यु – 24 जनवरी 1556 को दिल्ली के शेरमंदल महल में गिरे; 27 जनवरी को देहांत।
मृत्यु और विरासत

24 जनवरी 1556 को हुमायूँ अपने क़िले शेरमंदल (दिल्ली) में से ढलते समय सरककर गिर पड़े और 3 दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनकी देह पहले पुराना किला (पुराना किला) में रखी गई और बाद में बेटा अकबर ने दूसरा पानीपत का युद्ध जीतने के बाद उन्हें हुमायूँ के मकबरे में अंतिम निवास दिलाया। यह मकबरा मुग़ल वास्तुकला का पहला बड़ा गार्डन-तस्वीर स्तरीय मकबरा था और बाद में ताजमहल सहित कई इमारतों के लिए प्रेरणा बना। हुमायूँ को ग़ैर-आक्रामक स्वभाव और दयालुता के लिए भी याद किया जाता है; मुग़ल इतिहास में वे ‘इन्सान-ए-क़ामिल’ (पूर्ण मनुष्य) की उपाधि पाए।
मुग़ल शासकों की श्रृंखला

हुमायूँ मुग़ल राजवंश की गाथा में बाबर के बाद दूसरे स्थान पर थे। उनके बाद मुग़ल सिंहासन पर उनके पुत्र अकबर महान (1542–1605) आए। अकबर के बाद जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब और अन्य मुग़ल बादशाह हुए। मुग़ल बादशाहों की कड़ी में आगे बहादुर शाह प्रथम, जहानदाद शाह, फर्रुखसियर, रफ़ी उद-दारजात, शाहजहाँ द्वितीय, मुहम्मदशाह, अहमदशाह बहादुर, आलमगीर द्वितीय, शाहजहाँ तृतीय, शाह आलम द्वितीय, अकबर शाह द्वितीय और बहादुर शाह द्वितीय सम्मिलित हैं। प्रत्येक के शासन का विस्तार हिंदीइंडियन पर संबंधित लेखों में मिलेगा।
निष्कर्ष
हुमायूँ ने बाबर की स्थापना को मजबूती से आगे बढ़ाया और मुग़ल विरासत को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संघर्षों और अक्षमता ने मुग़ल साम्राज्य के परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया। दिल्ली का उनका भव्य मकबरा आज भी मुग़ल स्थापत्य की महान उपलब्धियों में गिना जाता है। इतिहासप्रेमियों के लिए हुमायूँ की गाथा मुग़ल साम्राज्य की एक रोमांचक कड़ी है।
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स्रोत: विश्वकोश एवं इतिहास ग्रंथों के संदर्भ (ब्रिटानिका, विकिपीडिया इत्यादि)