परिचय: मध्यकालीन भारत के विशाल इतिहास में दक्षिण-पश्चिमी दक्कन क्षेत्र में 10वीं से 12वीं सदी तक छाए रहे पश्चिमी चालुक्य (कल्याणी) वंश का विशेष स्थान है। प्राचीन [प्राचीन काल](Ancient Period) से [मध्यकालीन काल](Medieval Period) की ओर बढ़ते हुए राष्ट्रकूटों के पतन के बाद कल्याणी के क्षेत्र में यह नया राजवंश स्थापित हुआ। पाषाण-शिल्प और मंदिर-कला के क्षेत्र में इनके योगदान का उत्तर-दक्षिण तक प्रचलन रहा। इस लेख में हम ‘Hindi Indian’ इतिहास ब्लॉग पर पश्चिमी चालुक्यों के उद्भव, उनके शासकों, युद्ध-रणनीति, स्थापत्य कला और अवनति की पूरी व्याख्या देंगे।
उद्भव और स्थापना
राष्ट्रकूट सम्राज्य के पतन के साथ पश्चिमी चालुक्यों की स्थापना हुई। सन् 973 में मध्यभारत के मालवा के परमारा वंश के आक्रमण से राष्ट्रकूट राजधानी मन्यकटे में अराजकता फैल गई। इसी अवसर पर राष्ट्रकूटों के छद्म सामंत तैलप द्वितीय (957–997) ने विद्रोह कर केशवदत्त (करकट द्वितीय) को हराया और Manyakheta (अद्यत: मध्य कर्नाटक) को अपनी राजधानी बनाया। इस प्रकार तैलप द्वितीय ने पश्चिमी चालुक्य वंश की नींव रखी। उन्होंने नर्मदा नदी से लेकर तुंगभद्रा नदी तक फैले प्रदेशों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
तैलप द्वितीय के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी सत्यश्रय (997–1008) ने राजसत्ता को दृढ़ किया और दक्षिण में विजयनगर के राष्ट्रकूटों के विरुद्ध मथुरा तक अभियान चलाए। सत्यश्रय ने पूर्वी चालुक्य वंश (वेंगी) और अन्य शक्तियों के हमलों से रक्षात्मक संघर्ष किए। 1007 ई. में तंजावुर के चोल सम्राट राजेंद्र I ने बड़े से चोल सेनापति (नूरमुदी) के नेतृत्व में दक्कन पर आक्रमण किया, लेकिन सत्यश्रय ने Bijapur जिले के डोनूर के निकट उनका सामना किया। इस संघर्ष में चोलों ने विजयनगर (गंगापदी) एवं नोलम्बापदी पर अधिकार कर लिया, लेकिन पश्चिमी चालुक्यों ने भी अनेक मोर्चों पर प्रतिकार किया।
आगे जयसिंह द्वितीय (1015–1042) के समय में चोलों के साथ वेंगी क्षेत्र पर द्वंद्व युद्ध जारी रहे। जयसिंह द्वितीय ने 1020-21 ई. के आसपास वेंगी के सिंहासन के लिए कई युद्ध लड़े। साथ ही उत्तर-पश्चिम में मध्य भारत के परमारा और यदुवर्माओं से भी संघर्ष हुए, जिसमें जयसिंह ने संसाधनों और सामंतों को नियंत्रित किया।
प्रमुख शासक और शासकीय विस्तार
पश्चिमी चालुक्य वंश के मुख्य शासकों ने क्रमशः राज्य को विकसित किया और वंश की शक्ति को बढ़ाया। प्रमुख शासक निम्नलिखित हैं:
- तैलप द्वितीय (957–997): राष्ट्रकूटों के अधीन था, पर 973 ई. में राष्ट्रकूटों को पराजित कर Manyakheta में स्वतंत्र राजसत्ता की स्थापना की। नर्मदा से तुंगभद्रा तक अपना प्रभाव फैलाया और राष्ट्रकूट क्षत्रपों तथा परमारा आदि को वश में किया।
- सत्यश्रय (997–1008): तैलप द्वितीय का उत्तराधिकारी, चोल आक्रमण से विरुद्ध संघर्ष किया तथा कोंकण-गुजरात में नियंत्रण बनाए रखा। उनकी यात्रा स्मारक लिखाएँ गए हैं।
- विक्रमादित्य V (1008–1015): शासकीय क्रम में लघु शासनकाल में बिचौलिया, उत्तरी सीमाओं पर सफलता, पर सैन्य विस्तार सीमित रहा।
- जयसिंह द्वितीय (1015–1042): जयसिंह द्वितीय के काल में पूर्वोत्तर में वेंगी की राजनीति पर प्रभुत्व के लिए संघर्ष बढ़ा। उन्होंने 1024 ई. में मध्य भारत के परमारा सामंत और दक्षिण में कुछ विद्रोही यदुवर्माओं को परास्त किया।
- सोमेश्वर प्रथम (1042–1068): जयसिंह द्वितीय के पुत्र। चोलों से जूझते हुए इन्होंने 1042 ई. के आस-पास राजधानी को कैलास्य नामक कल्याणी स्थानांतरित कर लिया। सोमेश्वर I ने कई युद्ध लड़े; एक बार 1062 ई. में चोलों के राजा राजेंद्र द्वितीय को वेंगी (कक्कार्गोंड़) के युद्ध में मार गिराया। उनकी मृत्यु 1068 में एक तीव्र रोग के चलते तुंगभद्रा नदी में स्नान करते समय हुई (परमायोग)।
- विक्रमादित्य षष्ठ (1076–1126): सोमेश्वर I के छोटे पुत्र ने अपने भाई सोमेश्वर द्वितीय के साथ गृहयुद्ध छेड़ विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य VI के शासन को स्वर्णिम काल माना जाता है। उन्होंने कल्याणी चालुक्यों को दक्कन का सशक्त महा-सम्राट बनाया। उनके अधीनपदवी में राजपाठ का विस्तार हुआ; उन्होंने तुंगभद्रा से आगे पूर्व में बिहार-बंगाल तथा उत्तर में मालवा, मध्यप्रदेश, गुजरात तक अभियानों का संचालन किया। इनके शासनकाल में विजयवाड़ा के क्षेत्र में भी विजय प्राप्त हुई। समकालीन बालक-बिशोरी आदि विद्वानों का संरक्षण हुआ।
- जगदेकामल्ला द्वितीय (1138–1151): विक्रमादित्य VI के पोते। उनके समय में साम्राज्य की शक्ति अल्प-सी घटी, किंतु सांस्कृतिक गतिविधियाँ जारी रहीं। उनके अधीन देश को संभाले रखने का प्रयत्न किया गया।
- तैलप तृतीय (1151–1162): जगदेकामल्ला द्वितीय के भाई। इनके शासन के अंत में शासन-क्षेत्र तेजी से सिकुड़ गया। होयसल और काकती शासकों के आक्रमण बढ़े और तैलप III को विजयी काकती राजा प्रोल (1149) ने पराजित किया।
- समेश्वर IV (1181–1189): वंश का अंतिम शासक। उन्होंने कल्याणी छिन जाने पर अस्थायी रूप से विकलांग पुत्र के रूप में सत्ता संभाली। उन्होंने 1183 में अंततः कल्याणी पुनः प्राप्त की, लेकिन दो साल बाद चालुक्यों का अंत हुआ और यदुवर्माओं ने उन्हें बानवासी में निर्वासित किया।
इन प्रमुख शासकों के बीच अनेक सामरिक और प्रशासनिक घटनाएँ घटीँ, जिनसे वंश की स्थिति प्रभावित हुई। निम्न बिंदुओं में कुछ मुख्य कारक एवं घटनाएँ संक्षेप में:
- राष्ट्रकूटों के पतन: मालवा के आक्रमण और आंतरिक कलह का लाभ उठाकर तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट साम्राज्य को समाप्त किया।
- चोल संघर्ष (992–1120 ई.): दक्षिण में पश्चिमी चालुक्यों और थंजावुर के चोलों के बीच सौ वर्ष तक युद्ध जारी रहा। दोनों पक्षों के भारी-भरकम सेनाओं ने दशकों तक दक्कन के नियंत्रण के लिए संघर्ष किया। इन युद्धों से दोनों राजवंशों को भारी जनहानि हुई और वे कमजोर हुए। इस संघर्ष ने अंततः वेंगी क्षेत्र को उत्तर के सत्ता-संघर्ष का केन्द्र बनाया।
- पूर्वी चालुक्यों का हस्तक्षेप: आंध्रप्रदेश के पूर्वी चालुक्य वंश (वेंगी) पश्चिमी चालुक्यों का दूर का संबंधी होने के बावजूद पारिवारिक संबंधों के चलते चोलों के मित्र बने रहे। इससे पश्चिमी चालुक्य-चोल प्रतिस्पर्धा जटिल हो गई और उत्तर-दक्षिण में मैदान बहु-सेनात्मक संघर्ष का केन्द्र रहा।
- यदुवर्मा, काकती, होयसला आक्रमण: 12वीं शताब्दी में चालुक्य साम्राज्य कमजोर होने पर उसके सामंत (जैसे सिल्हार, काकती, कलचुरी, होयसला, यदुवर्मा) मुक्त हो गए। अल्प-काल में यदुवर्माओं ने दक्कन में फैलना शुरू किया। होयसला नृसिम्हा I ने तैलप III को मार गिराया। अंततः 1157 में कल्याणी के कलचुरी सामंत बिज्जल द्वितीय ने कल्याणी पर अधिकार किया और चालुक्य राजधानी को अन्नीगेरी (धारवाड़) ले जाने पर विवश किया।
स्थापत्य कला एवं संस्कृति
कला-शिल्प के क्षेत्र में पश्चिमी चालुक्य वंश की उपलब्धियाँ अद्वितीय हैं। इनका स्थापत्य कर्नाटक भाषा व पाषाण कला को पूरक नवाचारों के लिए जाना जाता है। कलेयणी चालुक्य वास्तुशैली (वेसरा शैली) ने बादामी (प्रारंभिक चालुक्य) और होयसला शैलियों का संगम किया। मुख्य विशेषताएँ थीं:
- विशेष स्तंभ-कला: मंदिरों में बड़े-फूले एवं लोहेरी आकार के स्तंभ बनाए गए, जिन पर बारीक मूर्तिकला और कर्पूराक्षरित नक्काशी थी। ये स्तंभ वास्तु को सहारा देते हुए मूर्तिकलाओं के उत्कृष्ट उदाहरण थे।
- ताराकार योजना: कई मंदिरों का तल आकृतिविहीन (stellate) या ताराकार बना, जिससे मंदिर चौरस की बजाय तारे जैसा चौर बन जाता था। इससे नयनाभिराम शिल्प उजागर हुए।
- सूक्ष्म मूर्तिकलाएँ: दीवारों और स्तंभों पर देव-देवताओं, अप्सराओं, मिथुन जोड़ों व पुष्पिका चित्रण की अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी की गई। ये काम साबुन पत्थर (soapstone) में किया गया था, जिससे अत्यंत बारीक काम सरलता से संभव हुआ।
- नवनिर्मितियाँ: मंदिरों के अग्रभाग में बादामियाँ सीढ़ियाँ (pushkarini) और विस्तृत मंडप बनाए गए। चतुर्भुज मंडपों में गुम्बदिया (खंभाएँ) और बहुखिल मण्डप की प्रणाली विकसित हुई।
प्रमुख स्थापत्य उदाहरणों में शामिल हैं:
- इतगी का महादेव मन्दिर: (1112 ई.) विक्रमादित्य VI के सेनापति महादेव दंडनायक द्वारा निर्मित यह मंदिर स्थापत्य कौशल का अद्भुत नमूना है। इसे देवलय चक्रवर्ती कहते थे, क्योंकि इसका प्रत्येक हिस्सा भव्यता में ‘मंदिरों का सम्राट’ माना गया। मुख्य मण्डप, अंतःमण्डप और गरुड़गर्भ यह प्रमाणित करते हैं कि कल्याणी चालुक्यों ने मंदिर वास्तु में चक्राकार शिखर और विस्तृत अंदरूनी संरचनाएँ विकसित कीं।
- कसिविश्वर मंदिर, लक्कुण्डी: किडुगुंडी तट पर स्थित यह शिवमंदिर कल्याणी चालुक्यों की जटिल नक्काशी का उदाहरण है। इसमें मूर्तियों और स्तंभों पर विष्णु-शिव आदि देवों की गहन नक्काशी देखी जा सकती है।
- मल्लिकार्जुना मंदिर, कूर्वत्ति: (11वीं शताब्दी) यह मैल्लिकार्जुना मन्दिर कल्याणी चालुक्य शैली की झलक देता है। इसका बाहरी ढांचा और लौहेरे खंभे दिखाते हैं कि इस काल में भी मंदिर की बनावट में जटिल ज्यामिति और सदृश आकृतियाँ कार्यशाली थीं।
- कल्लेश्वर मंदिर, बगली: यह मंदिर दिखाता है कि चालुक्य मर्मज्ञता ने दक्कनी शैलियों का सम्मिश्रण किया।
इन मंदिरों की न्यूनताविहीन नक्काशी और पट्टिकाएँ दर्शाती हैं कि लेटे चालुक्य स्थापत्य ने होयसला शैली को मार्गदर्शित किया।
इसके अतिरिक्त, कला एवं संस्कृति के अन्य क्षेत्र भी संपन्न रहे:
- साहित्यिक उपलब्धियाँ: इस युग में कन्नड़ एवं संस्कृत साहित्य फलफूल रहा। प्रसिद्ध कवि रन्ना ने कन्नड़ में महाकाव्य सहसाभीम विजय (गदायुद्ध) लिखी और उन्हें “कवि चक्रवर्ती” कहा गया। संस्कृत भाषा में 1129 ई. में शासक सोमेश्वर III ने मनसोल्लास नामक ग्रंथ रचा। महान गणितज्ञ भास्कर द्वितीय (1114-1185) के सिद्धांत शिरोमणी ने खगोल तथा अंकगणित को समृद्ध किया।
- नाट्य-संगीत एवं शिक्षा: राजदरबार संगीत-नृत्य का केंद्र बना। नाटक और नृत्य को प्रोत्साहन मिला। ज्ञान की स्थापना के लिए मठों, पुस्तकालयों और गुरुकुलों का विकास हुआ।
- धर्म और सामाजिक जीवन: यह शासन मुख्यतः शिवसंप्रदाय (श्रैविक) था, परन्तु जैन धर्म एवं वैष्णव धर्म को भी संरक्षण मिला। बसवेश्वर (Basavanna) जैसे संतों ने इसी मध्यकाल में चल्लुक्य दरबार में जन्म लिया। मंदिरों, मठों, और झरोखेदार सामाजिक ग्रंथों ने धार्मिक सहिष्णुता प्रदर्शित की। सर्वधर्मसमभाव इस युग की विशेषता रही।
प्रशासन और अर्थव्यवस्था
काल्याणी चालुक्यों की व्यवस्था कट्टरकेंद्रित नहीं थी। सामन्तों को स्वायत्तता दी गई, जिन्होंने ‘मंडल’ (प्रांत) अधिपति के रूप में क्षेत्र संचालित किए। उदाहरणत: अलूप, सिल्हारा, होयसला, काकती, कलचुरी, यदुवर्मा इत्यादि क्षत्रपों ने प्रांतो को संभाला एवं दरवाजे की तरह कर (प्रतिवर्ष) चुकाते रहे। राजकीय पदों में महाप्रधाना (प्रधानमंत्री), बंधुविग्राहिका, धर्माधीश, तदेयदंडनायक इत्यादि शामिल थे। राजकीय राजधानी के पश्चात् अन्नीगेरी (अन्नीगरि, आज़ कल धारवाड़) में तथा बाद में गांगराम (हंपी) में शासन चलता रहा जब कल्याणी पर कब्जा हुआ।
आर्थिक दृष्टि से वंश ने सोने के मुद्रण को प्रचलित किया। ये मुद्राएँ ‘गद्यनका’ (96 रती) से लेकर छोटे सिक्कों तक थी। कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के साथ निर्यात और व्यापार भी फला-फूला। औद्योगिक कुटीर, स्नात्य विद्या प्रतिष्ठान और यात्रियों के लिए सरायों का निर्माण हुआ।
पतन और उत्तराधिकार
चालुक्य–चोल युद्धों (992–1120) से दोनों पराक्रमी राज्य थक गए। विक्रमादित्य VI की मृत्यु (1126) के बाद साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होने लगा। 12वीं सदी के मध्य में चालुक्य सामंतों और पड़ोसी राजाओं के बीच संघर्ष बढ़ा। कल्याणी चालुक्यों ने उत्तर में वेंगी गंवा दी और 1149 में काकती प्रोल ने तैलप III को कैद कर दिया। 1150-60 के दशक में होयसला हर्षवर्धन I ने तैलप III को मार गिराया, और अंततः कल्याणी के कलचुरी प्रमुख बिज्जल द्वितीय ने 1157 में राजधानी प्राप्त की। इससे चालुक्यों को अन्नीगेरी (अन्नीगेरी) में राजधानी ले जाना पड़ा।
अंतिम शासक सोमेश्वर IV ने 1183 में कल्याणी पुनः छीन ली, किंतु होयसला वीर बल्लाल II ने कृष्णा घाटी में युद्ध जीतकर यदुवर्माओं को पराजित किया। पर 1189 में यदुवर्मा भवभूति ने बानवासी में सोमेश्वर IV को निर्वासित कर दिया। इस प्रकार से दशकों का संघर्ष समाप्त हुआ और कल्याणी चालुक्य वंश का अंत हो गया। उसके अवशेष पर होयसला और यादव साम्राज्यों ने अधिकार जमाया।
निष्कर्ष
पश्चिमी चालुक्य (कल्याणी चालुक्य) वंश दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक मील का पत्थर है। इनकी स्थापत्य कलाएँ और साहित्यिक योगदान आज भी दक्कन की धरती पर अपना प्रभाव दिखाते हैं। जब तक इनका शासन था, ये कला, ज्ञान और सांस्कृतिक एकता के ध्वजवाहक बने रहे। हिंदी इंडियन की यह शोध-प्रबन्ध आपको पश्चिमी चालुक्य वंश का सम्पूर्ण चरित्र प्रस्तुत करता है। इतिहास रसायन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह अन्य मध्यकालीन विषयों में भी दिलचस्पी बनाए रखेगा।
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